अपने अंतर्मन के भावो को उकेरती लेखनी को थामता हुआ कोई खोया हुआ लेखक मेरा अपना वो खोया सा ...प्रतिबिम्ब
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020
बुधवार, 1 अप्रैल 2020
कितना पाया है खुद को खोकर : वक़्त के मानिंद स्वयं के आंकलन का दस्तावेज़ (अंतर्मन की कलम से)
कितना पाया है खुद को खोकर : वक़्त के मानिंद
स्वयं के आंकलन का दस्तावेज़ (अंतर्मन की कलम से)
अमित तिवारी ‘शुन्य’;
लेखक;
पर्यटन
शिक्षक (सहायक प्राध्यापक भा.प.या.प्र.स.)
, विचारक व प्रेरक वक्ता
यू तो जिन्दगी वक़्त ही ही कहा देती है अपनी भाग
दौड़ से,कि कोई फुर्सत ग्रस्त आदमी अपने लिए दो घूँट का समय भर निकल सके कि कहीं
स्वयं की भी ताकीद कर सके I वैसे यह छलावा तो नहीं लेकिन हकीकत जरुरत है कि
जिन्दगी दौड़ती बहुत है कभी फुर्सत के लिए और कभी फुर्सत से I भाई हर खासो-आम के
बारे मैं मुझे क्या पड़ी है, मैंने तो खुद का हिसाब लगाने की जुगत बस लगायी हैI सच
है समय लगाम अपने पास ही रखता है..पर क्या कभी ऐसा हो सकता है की समय की लगाम
हमारे हाथो में आ जाये I बुजुर्ग इसे ही शायद वक़्त हमारा होना कहते हैं ...यह उम्र
या तजुर्बे से नहीं बस वक़्त से होता है की हमे अपने लिए वक़्त मिले , फिर अगर दुसरे
नज़रिए से सोचा जाए तो कभी इस बात का इल्म हो उठता है कि दोस्त वक़्त तो है शायद
वक़्त को सही लहजे में संभाला ना गया ..कुछ मुफ़ीद न हुआ तो कुछ आदतें खा गईं I अगर
मगर तो चलता ही रहता है लेकिन इंसानी याददाश्त कोई सरकारी व्यवस्था से चलने वाला
तंत्र नहीं यह तो वो कोना है जहां सत्ता बस अपनी ही होती है I याददाश्त के अंतिम
कोने से जब यहाँ तलक देखा कि आजतलक तक की दौड़ मे कुछ सुकून है तो कुछ शिकन भी है
कुछ प्रयास हैं तो कुछ प्रतिफल भी ,यह सब जब अंतर्मन में किसी चलचित्र की तरह चलता
है तो विधाता से मिले जीवन पर एक मुस्कान भरा पल तो मिल ही जाता है ..अरे दोस्त
पानी भी समतल पर बहता है तो टेढ़ा मेढ़ा हो ही जाता है मसलन जिन्दगी की दौड़
में..अमां यु तो दौड़ना अभी पूरा कहाँ हुआ है ? यह तो एक लम्हा भर है जिसने ताक़ीद
की कि खुद से खुदी का हिसाब ले लो ज़रा...याद आता है की जीवन एक सही दिशा में चल
पड़ा हो जैसे –सुकून है दो वक़्त की रोटी है बाइज्ज़त अपने कर्मो से लेकिन धन्यवाद है
उस परवरिश का जिसने क्या ख़ूब सिखाया..तरबियत दी ...हाँ कभी लगा की कुछ और मिलता तो
बेहतर होता फिर एक इमानदार ख़याल आया यूँ कि इस कमी की कसक में भी एक पूर्णता है I
अक्सर हमने जो भी पाया है या कि जो भी मय्यसर है उसकी हमे कीमत भी कहाँ होती है और
जो नहीं मिला या की रह गया उसकी ख़ाहिश या शिकवा पहले कर लेते हैं लेकिन एक
निष्पक्ष मन से ताक़ीद की तो पाया की परवरिश बहुत बड़ी नैमत थी ,यहाँ तरबियत उस कारण
का नाम है जिससे हम बिना हारे लड़ते रहे हालतों से और हुनर सीख गयी लड़ने का जिसने
हमे जिन्दगी के किसी मोड़ पर टूटने नहीं दिया चाहे वो दो वक़्त की रोटी कपडा और मकान
की जरुरत भर नहीं था बल्कि इज्ज़त की वो डगर थी जो शायद इन्सान नामक प्राणी की सबसे
बड़ी धरोहर होती है I किसी भी वक़्त इंसान को अपने पूर्ण न होने (कमी होने) की ख़लिश
रहती भी है ...लेकिन फिर भी संघर्ष लाज़मी है वरन बानगी है की हम जिन्दा हैं और खुद
को पाने की जुगत में हैं लेकिन बिना कुछ खोये कुछ पाया जा भी नहीं सकता I लेकिन सुकून
है मेरे मन की खुद को इस तरह खपाया की खुदी से सवाल करते की कहाँ आ गए हम अब ? खेर
! इस सवाल के जबाब में भी हमे एक सवाल ही मिलता है कि “ दोस्त देख तो लो /सोच तो
लो चले कहाँ से थे और अब तलक आये कहाँ हैं ” ! शायद यह प्रश्न उन सभी जबाबों की
बानगी होगा जो इन्सान कभी अपने अंतर्मन में कहीं करता हो कभी कि कितना पाया ख़ुद को
खोकर I यहाँ लाज़मी बात यह भी है की पाना क्या है और खोना किसे कहते हैं ? इसको भी
सिलसिलेवार समझा जाना चाहिए ; पाना किसी प्रक्रिया का नाम नहीं बस दौड़ है संघर्ष
की जिसने जितना किया उसे उतना मिला भी है और रही बात खोने की तो यह जरुर एक
प्रक्रिया है एक सिलसिला है उस पाने की जिसके पाने के लिए जो भी कुछ पीछे छूट जाता
है , कुछ जो साथ नहीं रहता पाने की दौड़ के साथ या की यूँ कह लें की पाना साथ लाता
है उन तमन्नाओ, खाहिशों का गंवाना बनकर , जिसे हम खासोआम खोना कहते हैं जैसे स्कूल में अव्वल आने के ख़्वाब को पुरा करते
करते कभी मैदानों का वो खेल कहीं खो गया या कि अपना कोई शौक़ हाशिये पर चला गया हो
जैसे या कि जिंदगी में सफलता की ख्वाहिश ने कई अनमोल पल हमसे छीने हो जैसे वो
सुबहों की ताज़गी या की शाम के ढलते सूरज की मौज ; या फिर अपनों का साथ और बहुत कुछ
ऐसा जिसकी कोई क़ीमत नहीं होती अगर वो सब ना खोता या छूटता तो शायद आज जिसे लोग
सफलता कहतें हैं नहीं मिलती और दुनिया में यक़ीनन सफ़लता से ज्यादा कीमती कुछ भी
नहीं I तो इस सफ़लता की कीमत जो हमने चुकाई है वो शायद बेशकीमती है और इसको यकीन से
तो नहीं बस याद्दाश्त की feeded रील से आंकलित कर जरुर सकता हूँ बस मेरे लिए या
किसी मेरे करीबी के लिए इस तरह से :-
बचपन के दिन: मालूम हो की इंसा (हरेक) की ख्वाहिस
होती है कि कोई उसका बचपन उसे फिर से लौटा दे I लेकिन कई बार जिन्दगी को पटरी पर
लाने भर या कि यु कहूँ की सफ़लता की नीव के लिए कई बार बचपन के दिन कहीं खो जाते
हैं या की यु कहें की शायद आते भी नहीं हैं और कठोर सच्च्चाई तो ये भी है की खो भी
जाते हैं हाँ खो जाते हैं ..खेर !
समझदारी के दिन: महत्वाकांक्षा की उत्कंठा व्यक्ति के
समझदारी के दिनों को समझौते के दिनों में बदल देती है I और समझौतावादी रवैया
समझदारी का ही पर्याय बन बस जिन्दगी में महत्वाकांक्षा को बढ़ाता, बनाता और पालता है
I मसलन मुझे कुछ मिल जाये अगर मैं समझदारी ओढ़ लूँगा, ग़ैरमुमकिन ही क्यों ना हो
..खोकर इस नासमझी को ही, इसे पाया जाता है I रोज़ी के लिए बोस (हिटलर) की फटकार सुन
कर सहज रहना समझदारी है आज़ाद्बयाँ जिंदगी उस फटकार को बर्दाश्त नहीं करती इसलिए
क़ाबिल-ए-गौर यह है कि मुझ जैसे कईयों ने
नासमझी (आज़ाद्बयाँनियो) को ही फटकार दिया ज़िंदगी
से I उसे खोकर ही समझदारी आई है:-
रोटी पै टिका है पेट और रोटी टिकी है नौकरी पै
मेरी
अच्छी हो, ना हो पर जरुरत तो है ये नौकरी मेरी
पढ़ाई लिखाई बस की केवल पढाई लिखाई : बस इसी को कोई सब
कुछ खोकर पाता है डिग्री , डिग्रियां .... तरबियत या की इल्म जो की जरुरत सच है
पाया है इसे बहुत कुछ खोकर बस अंतर्मन ही जानता है I
संघर्ष नौकरी के लिए : इल्म हांसिल कर इंसा ओरों से जुदा हो जाता
है कहते रहे बुजुर्ग लेकिन इस दौड़ में आकर लगा की अक्ल कम थी अमां जो की इल्म में
लगे रहे असल इल्म तो बस वो नहीं था जिसके लिए हमने सुकून भरे पलों को खोया और आज
की इस स्थिति तक स्वयं को पा सकें I लेकिन ग़मज़दा नहीं है ख़ुश हैं कि संघर्षों की
जरुरत का पता लगा हमें, खेर पायी एक अदद नौकरी जिसे सबसे बड़ी नैमत कहा जाता है I हक़ीकत
में खोया तो ख़ुद को भी है इसे पाने के लिए पाने के लिए और पाकर भी लगा की कुछ खोया
है शायद I
संघर्ष नौकरी में मियां अब इसे भी बताने की जरुरत है क्या
....छोड़ो यु ही नहीं दे देता कोई वेतन या कि तनख्वाह या कहूँ सैलरी I दिन भर तो
निकल जाता है नौकरी में रात सोकर सोचने में कि नौकरी में क्या चल रहा है
मियां बहुत कठिन है दौड़ दफ्तर कि और हमने
इसके लिए भी खोया तो बहुत कुछ है ही ना य़ार salt एंड पेपर हो गए I
और ना जाने कितने संघर्ष नौकरी बचाने के लिए भी
बेपरवाह जीने वाला एक विचारक भी यदि अपने विचारों तक को बेडियों में बांध देता है
तो समझो हुजुर इससे ज्यादा क्या कीमत देगा कोई इस दो वक़्त की रोटी की लेकिन अगर
व्यावहारिक होकर सोचा जाय तो समझ आएगा की जो खोया है अगर उसे पाया होता तो जो पाया
है वो कभी नहीं पाते जो कुछ हमने पा लिया, मसलन सुकून के लिए संघर्ष जरुरी है तो
कभी ख़ुश रहने के लिए चुप्पी भी जरुरी है I दरअसल पाकर खोना और खोकर चीज़ों को पाना एक
स्वाभाविक प्रक्रिया है और शायद यही इन्सान का सबसे बड़ा इम्तिहान है कि उसने क्या
खोया और इससे क्या पाया I जो खो दिया उसे संसार नहीं पूछता बस पूछता है तो कि उसके
पास क्या है अभी इसलिए मियां अंतर्मन का आंकलन अपनी स्तिथि जानने के लिए तो ठीक है
लेकिन जो मिला है वो भी बहुत कुछ खोकर /आहुति देकर कमाया है I सुकून है कुछ पाया
तो सही कुछ खोकर ही सही I
रविवार, 25 अगस्त 2019
“केवल ना ना की नकारात्मकता नहीं किमपि, कदाचित त्वमेव विचारम अपि सत्यम ब्राजते का भाव”
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विशालकाय सेट पर अर्णब का दौड़ना चैनलों की अंतहीन पीड़ा से मुक्ति की पुकार है
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| के प्रतिउत्तर मे मेरा आपको विनय :
दिनाक 25 अगस्त 2019
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श्रीमान अर्नब का तो पता नहीं लेकिन बहुत दिनों बाद आपके ब्लोग्स पुनः (लगभग 5 वर्षों बाद ) की विषय वस्तु देखकर लगता है :
१. आप सिर्फ अपने साथियों मेरा मतलब पत्रकारों पर ओक्षी भाषा मे
बस भद्दे टिप्पण लिख सकते हैं
२. आपका (ब्लॉग की )विषयवस्तु जो पिछले ६-८ सालो मे अकादमिक थी अब केवल निंदापरक
,वो भी बिना किसीतर्क
के
३. आलोचना एक गुण है , जो की समीक्षात्मक तरीक़े से सम्मान के साथ
किया जाता है
४. शायद आप विरोध और सिर्फ मोदी विरोध मे ऐसे खो गए , की तार्किकता , संप्रेषण व पर
सन्मान तो कही दूर बहुत दूर रह गया बस नकारात्मकता ने शायद आपकी सृजनात्मकता छीन
ली हो जैसे
देखिये हर व्यक्ति का एक औरा होता है जो उसकी प्रतिभा , ज्ञान व कौशल को
दिखता है ..यकीनन आप कुशल है किन्तु शायद उपरोक्त वर्णित बिन्दुयो मे आप बीते 5-6 सालो मे घोर निरर्थक, नकारात्मक व ना जाने
क्यों सिर्फ निंदा रस प्रस्तुत कर रहे हैं....
खेर यह आपका जीवन , पत्रकारिता है ..आप स्वयं मे सक्षम है
स्वयं को जो कुछ भी साबित करना चाहते हो ...
मगर सच मै आज कई सालो बाद आपका ब्लॉग naisadak देखा , टटोला ....सच मैं पहले जैसी बात नहीं रही....यह मेरा आंकलन
मात्र है ..जैसे पहले कभी आपको पढ़कर लगता
था अब कुछ और ही लग रहा है ..
बस नफरत मत परोसिये ...ऐसा मेरा आग्रह है दूसरा जैसे कई नेता
वगेरह आपको जैसे पसंद नहीं कर पाते वैसे ही सच किसी खुले मैदान मे ऐसे भी दीखता है
जैसे आप भी उन्हें पसंद नहीं करते ...तो निरपेक्ष तौर पर आप भी निष्पक्ष नहीं दिख
पाते ....तो जाहिर है आप से भी सामान्य लोगो को उम्मीद है कि आप भी निष्पक्ष
एवं तार्किक व सकारात्मक होंगे जैसे आप पहले थे
आदरणीय मैं ना आपका विरोधी हूँ ना आलोचक...शायद आपका प्रशंशक ही रहा हु
किन्तु क्या कहू, अब आपके निष्पक्ष हो और केवल और केवल विरोध विरोध और विरोध को छोड़ कर
खुले कैनवास पर निष्पक्ष व सकारात्मक पत्रकारिता का आकंशी हूँ जैसा
की आप को रैमन मैगसायसाय , पुरुष्कार मिला है उसके मुताबिक आपको वर्ताव भी करना चाहिये, निश्चित तौर पर आपके
द्वारा एक नकारात्मकता, विरोध च केवल विरोध की भावना व ऊपर लिखे निरर्थक ब्लोग्स विषयों की बजाये सकारात्मक , आलोचनात्मक व सार्थक
व खुले मन से पत्रकारिता की जानी चाहिए न की बस सदैव नकारात्मकता
यहाँ यह भी कह दूं जो आप कर रहे है उससे बहुत ऊपर का शायद स्तर
है आपका
लेकिन आपके लिए
वैरम वैरम सदैवं नास्ति उचितं च प्रवीनम
व्यक्ति हठ से नहीं निष्काम कर्म या कि आपके परिपेक्ष्य मे
निष्पक्ष पत्रकारिता से ही महान होता है शायद ना की सम (peer) निंदा से
आपके किसी
निष्पक्ष , नवीन , नवोदित , विचार व लेख की प्रतीक्षा मे
शुभकामनाए आदरणीय मित्रवर
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चित्र आधारित स्वरचित रचना “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’
चित्र आधारित स्वरचित रचना “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’ ग्वालियर, भारत ; 30.06.2023 ...
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“रिश्तों की समझ” द्वारा अमित तिवारी “शून्य” एक अतुकांत कविता =======================================================================...
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लघु कथा : राह स्वरचित (मौलिक ) द्वारा अमित तिवारी “ शून्य” ग्वालियर म.प्र. 31.08.2021 ==================== आज सुबह से ही म...
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‘ शक्ति की आराधना ’ - पर्याय पद्धति व प्रासंगिकता आलेख द्वारा अमित तिवारी सहायक प्राध्यापक , भा.प.या.प.स. ग्वालियर म.प्र. …………………………...

