मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

“संदेह की गहरी जडें” एक लघु कथा द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘ ग्वालियर , म.प्र.

 

“संदेह की गहरी जडें”  एक लघु कथा

 

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘

ग्वालियर , म.प्र.

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   इंसानी मस्तिष्क में अपने प्रति किए गए नियत अच्छे कर्मों की याद रहे न रहे लेकिन स्वयं के प्रति हुए नकारात्मक या कि कहें दुर्घटनाओं का मनुष्य के मस्तिष्क पटल पर प्रभाव रहता ही रहता है।   सुषमा आज रोज की तरह सुबह जल्दी नही उठ पायी, न जाने क्या बात मन में घर कर गई हो जैसे । उठी तो नही थी लेकिन सोई भी नही हो जैसे ये रात संदेह की गहरी कालिमा लिए अनघट सी बढी जा रही थी। ‘विनोद तो बहुत अच्छे इंसान है पर वो ऐसा क्यों करेगें‘ आदि के मनोभाव बार बार मन में कोधते हैं शादी से लेकर अब तक क्या मैं उन्हे सही से जान पायी हूँ ? एक सामान्य कद काठी का सजीला सहज विचार मग्न व्यक्तित्व इतना निर्लिप्त और राग रहित क्या किसी..... अरे नही नही.... ‘शायद ये प्रतिबिम्ब ही गलत दिखा मुझे’; लोग जैसे होते है वैसे दिखते नही। लेकिन विनोद ही क्या कोई और इंसान भी इस लम्बे दस साल के दांपत्य के निजी जीवन में दोहरा चरित्र रख सकता है; 10 साल तक खुद को झुठलाने का अभिनय तो कोई नही कर सकता। मेरी ही मति मारी गई है जो संदेह कर रही हॅू विनोद तो सज्जन स्वभाव के है उनके जैसा तो शायद आज दौर में होता भी नही कोई तो क्या वो वाकई झूठी तस्वीर थी जो मैने दस बरस से देखी। हे राम! मुझे ही कुछ भ्रम हुआ है ;ये रमा भी कुछ कोई ठीक औरत नही है तो विनोद उसके प्रति आकर्षित हो भी सकते हैं खैर सारे मर्द एक जैसे होते है I इस बात का अहसास शायद सुषमा को संदेह के घेरे में डालता निकालता रहा। अपने स्वयं के अंतर्द्वंद से लडती रही अचानक उसकी सहेली विमला का फोन आया। चपल विमला की बातों का कैसे बर्दाश्त करूंगी ये सोच कर फ़ोन डायल से काट दिया लेकिन फिर से फोन पूरी तेज आवाज के साथ बज उठा शायद कोई जरूरी बात रही होगी। सोचते हुए सुषमा ने विमला के फोन को अटेन्ड करने के लिए फोन उठाया ही था सुषमा की आवाज सुने बिना विमला ने कहा सुषमा इतने देर से फोन क्यों नही उठा रही थी और व्हाट्सअप पर ये विनोद भाईसाहब के बारे में क्या लिख रही हो। तुम्हे मालूम है कल भाइसाहब के आदर्श चरित्र को देखकर तुम्हारे सौभाग्य को सराह रही थी। कल तेरे घर पर काम करने वाली रमा के साथ सडक पर कुछ लडके छेडखानी कर रहे थे विनोद भाईसाहब ने एक बडे भाई के तौर पर उन मनचलों को न केवल डांटा बल्कि सबके सामने रमा को अपनी बहन बता उसकी लाज बचाई और उन मनचलों को भी एक बडे भाई के तौर पर बहुत अच्छी शिक्षा दी सच में सुषमा तुझे बहुत सदाचारी, गुणी और नेक पति मिला है। और तू संदेह के घेरे में पता नही क्या सोचती रहती है?  मन ही मन विमला की इन बातों को सुनकर अवाक् सी रह गर्व और ग्लानि दोनों से भर गई अपने मन में पैदा हुए संदेह के घेरों से विमला के वचनों से मुक्ति पा अपने आदर्श पति विनोद से मन ही मन क्षमा मांग उठी जीवन में संदेह के घेरे संबंधों को खराब कर सकते है। आज तो विनोद के प्रति मेरे संदेह को समय रहते ईश्वर ने दूर कर दिया लेकिन खुद के जीवन में संदेह से घिरे व्यक्ति के लिए कोई दवा काम नही आती । वो स्वयं के सभी रिश्ते ख़राब कर लेता है ;भगवान मुझे विनोद के लिए ऐसा सोचने के लिए माफ कर दे।

 

 

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘

ग्वालियर म0प्र0

दिनांक 06 अक्तूबर 2020

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

ये उस समय की बात है एक अतुकांत स्वरचित कविता द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

 

ये उस समय की बात है

एक अतुकांत स्वरचित कविता

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

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ये तो समय की बात है,

ये समय-समय की बात है,

यह उस समय की बात है,

 

ये बात बदलते दौर की

ये बात अपनी या और की

ये बात समय के उस छोर की

 

जहाँ समय रुका न था

मोहक ‘चना’ मिला न था

बेहद घना स्वप्न रहा था

 

मगर अब समय कुछ और है

बीते हुए की तो जीत है

पर हारे हुए कुछ मीत है

 

पर आज चना भले मिल गया

पर दांत वो मेरा कहीं सो गया

वो ख्वाहिशें वो दौर अब कहीं खो गया

 

पर समय का पहिया कभी

रुकता नहीं यह तो भी

है एक फलसफा जीने का भी

 

दोस्त सब बदल गए,

या की समय की रेत में खो गए,

जो रह दिल में रह गए,

 

हाँ यह तो समय की बात है

हाँ समय- समय की बात है

हाँ यह सब समय के ही हाथ है

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द्वारा अमित तिवारी “शून्य“

ग्वालियर म.प्र.

05.10.2020

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

चेहरे और नयनों के भाव एक चित्र लेखन : द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

 


चेहरे और नयनों के भाव

एक चित्र लेखन : द्वारा अमित तिवारी “शून्य”, ग्वालियर म. प्र.

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चेहरे के शाश्वत भाव में

   गहरी कई बाते छिपती हैं

 

नेत्रों के अपलक खुलने में

     प्रेम की परते दिखती हैं

 

नेत्रों की बहती धारा में

    जीवन संताप छिपाती हैं

 

वो बन भार्या यु जीवन में

   निज पत्नी धर्म निभाती है

 

यह जान के की तुम में

  ही वो जीवन को पूर्ण मानती है

 

तेरे जाने के इंतज़ार में

   जीवन का नेह लुटाती है

 

 

क्या नयनो में क्या अधरों में

         तेरा ही संताप छिपाती है  

पीड़ा –विरहन की तन में

   मन में जीवन में आग लगाती है

 

बदली में या की बसंत में

     मिलने का राग जगाती है

 

मेरे नैना तड़पे यह सुन

की हैं तुमको आने में कुछ दिन

दिल की धड़कन भी है सुन्न

मेरा मन तन जीवन सब सून

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द्वारा अमित तिवारी “ शून्य “

ग्वालियर म. प्र.

04.10.2020

 

 

 

शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

दायरे जिंदगी के - कभी शिकायत कभी ख्वाहिश एक अतुकान्त कविता द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य'

 

दायरे जिंदगी के - कभी शिकायत कभी ख्वाहिश

 

एक अतुकान्त कविता

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य'

ग्वालियर म.प्र.

 

 

शिकायत करें या हिफाजत करें,

जिंदगी से कैसे हम बगावत करें,

नही ढाल कोई ना कोई है रक्षक,

यहाँ तो मसीहा स्वयं का है निंदक,

सज़ा काटता है जो जिंदगी काट लेता,

नहीं ज्ञान हमको ना ही ज्ञान होता,

अगर जिंदगी से वो ना दो चार होता,

खुदी से शिकायत खुदी से लडाई,

कहानी अजब है जिंदगी की मेरे भाई,

अचानक जो होता है वो भी है निश्चित,

फिर निचिश्त को क्यों माने हम अनिश्चित,

ज़रा जन्म मृत्यु तो तय फ़लसफ़ा है,

हमें जो मिला है वो हमने ही गढा है,

बडे राज गहरे समेटे है जीवन,

बिना चेतना के ‘शव‘ बनता ये तन,

दुःख-सुख के बेडे, बडे हैं घनेरे,

वही बच सका है जो हैं राम के चितेरे,

दवा भी नही है दुआ भी नही है,

जीवन की डोर पर ‘काल‘ तो रूका भी नही है,

प्रणय हो की द्वेष हो सब देह से हो,

मृत्यु के परे तो कल्पना भी हेय हो,

कैसी भी हो कंचन काया जीवन के दर्पण की,

होती है बस नींद टूटे सपने टूटे की सी उम्र की

बडा फलसफा है जिंदगी का खुद से लडकर,

ये आबाद होती है नित बनकर बिगडकर,

कहाँ छिप सका है स्वयं से कोई राही,

जिंदगी के उपवन में मिले सब हैं राही

 

दायरे जिंदगी के सच ही है

कभी तो शिकायत हैं

और कभी ख्वाहिश हैं

 

 

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘

ग्वालियर म.प्र.

दिनांक - 03.10.2020

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

क्यों गाँधी बनना चाहूँ मैं ? एक अतुकांत कवित्त द्वारा अमित तिवारी “शून्य “ ग्वालियर म.प्र.

 

क्यों गाँधी बनना चाहूँ मैं ?

एक अतुकांत कवित्त

द्वारा अमित तिवारी “शून्य “


ग्वालियर म.प्र.

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पहन के खादी कहलाऊ गाँधी मैं,

      यूं तो बनना चाहूं गाँधी मैं,

            पर क्या गाँधी हो पाया मैं,

               क्या उस सा  त्यागी तपी हो पाया मैं,

 

पोरबंदर का स्तर हो मुझ मैं,

   या कि डरबन का सा संघर्ष कर पाया मैं,

              सत्य के पथ पर बिना डिगे चल पाया मैं,

                  शोषण के प्रतिकार में वाणी को अधरों तक क्या लाया मैं,

 

निरानंद या कि हो कर योगी

     तप के बल पर सत्य लपेटे

       बांध लंगोटी ओढ़े खादी उघडे तन

          दृढ़ता से क्या बन पाया त्यागी मैं

 

हाँ बनना नेता तो चाहा,

   क्या लेकिन उन में ढल पाया,

          पाने प्रसिद्धि और बनने गाँधी मैं,

               पर क्या सच गाँधी बन पाया मैं,

                  हाँ दंभजनित एक आंधी बन आया मैं,

 

     क्षमा करो प्रभु , अतुलनीय बल मैं

         समेट निज मन में, कहाँ बदल स्वयं को पाया मैं  

 

छोड़ा गाँधी बनने का सपना,

     करूँ सृजन मुझमें मैं अपना,

                     बन स्वयं चल सकूँ,

                         गाँधी के सच के दर्शन पर,

 

हो कर निज जीवन धन में

गाँधी सम

गाँधी सम

 

*राष्ट्रपिता को समर्पित

द्वारा  - अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म. प्र.

 

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

धुंए में समाप्त हो रहा युवा धन- ‘कूल अंदाज, चिल्ड मिजाज, दुनियां में दम मारों दम और जियो’ की विचार धारा का एक सम्यक् आंकलन आलेख: द्वारा अमित तिवारी - सहायक आचार्य

 

धुंए में समाप्त हो रहा युवा धन- ‘कूल अंदाज, चिल्ड मिजाज, दुनियां में दम मारों दम और जियो’ की विचार धारा का एक सम्यक् आंकलन

आलेख: द्वारा अमित तिवारी - सहायक आचार्य

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान ग्वालियर

(पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार का एक स्वायत्त निकाय)

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वर्तमान परिपेक्ष्य में युवाओं का जीवन के प्रति रवैया उनकी बदली सोच और बदलते आयामों में होने वाली उनकी परवरिश के कारण विशेषकर देखने को मिलता है। यकीनन कोई भी बच्चा विशिष्ट है और अपने अभिभावकों की अमूल्य निधि होता है। युवा समाज और देश का भविष्य है और इस बहुत युवा देश की 30 प्रतिशत आबादी 16 से 35 वर्ष के आयु वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। यहाँ यह कह देना बहुत आवश्यक है कि युवाओं की मानसिकता में धुंए रूपी विकार के पनपने का कारण, कारक और केन्द्र कुछ और नही युवाओं को लेकर कुछ मूलभूत गलतियां है जिनके समय रहते निदान न हो पाने के कारण वे समग्र युवा जीवन को ग्रस उन्हें यथेष्ट समापन की राह पर ले जाती है। जहाँ उनके सपने आत्मविश्वास, विचार और उनका स्वयं धराशायी होने लगता है। ममत्व और पितृत्व का नेह भी उनकी भटकी हुई मानसिकता को बदल नही पाता और युवा जीवन एक खोखले और दुर्दान्त अन्त की तरफ चलायमान होता है। आज देश और अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में नशा खासकर ड्रग्स एक महती चिन्ता का विषय बन देश और समाज की जडों को खोखला कर रहा है। रूककर यहाँ सोचने की आवश्यकता है कि जीवन का एक ऐसा हिस्सा जहाँ रचनात्मकता, ऊर्जा, कलात्मकता, ख्वाहिशें, सपने और उनकी उडान और उन्हें पूरा कर लेने का ओज और ऊर्जस्विता आखिर कहाँ, क्यों , कब , कैसे खो गई या नशे और धुंए की लत जीती जागती जिन्दगी को एक जिन्दा लाश कब बना गई गौर ही नही किया जा सका। यकीनन नशे की यह लत और उसका बढता प्रभाव कुछ ऐसे कारण है जिनसे सभवतया यह बढ़ता ही रहा होगा। -

1. पारिवारिक स्थितियां,

2. परवरिश आधारित त्रुटियां,

 3. संगत आधारित शुरूआती शौक,

 4. अभिभावकों का अत्यन्त व्यवसायी व आंकाक्षी रवैया,

 5. पारिवारिक कलेश,

 6. बाल मानसिकता पर भावनात्मक चोट,

7. गलत परंपराओं /आदतों का निर्वहन

1. पारिवारिक स्थितियां- जीवन मूल्यों के पतन और इनसे बनती बिगडती गृहस्थी की स्थितियां युवाओं को एकाकी जीवन और नशे के दलदल में धकेलती हैं और यहीं से शुरूआत होती है एक पतनयुक्त जीवन की।

2. परवरिश आधारित त्रुटियां - परवरिश के प्रति सिद्धान्त भाव से भटकाव बच्चों में अलगाव और विद्वेष की भावना को बढाकर उन्हे एकाकी और नशे के प्रति आकर्षण के प्रति बाध्य करता है।

3. संगत आधारित शुरूआती शौक- मित्र प्रभाव में गलत शौक और संगति का अनुसरण व्यक्ति के पतन का सृजन करता है और यह शुरूआत एक विस्फोटक और दुर्दान्त अन्त जो बेहद जटिल और घृणित अन्त की शुरूआत करता है।

4. अभिभावकों का अत्यन्त व्यवसायी  व आंकाक्षी रवैया- आज के व्यवसायी दौर में गृहस्थी के उन्नयन और शौक आधारित जीवन शैली की बली बच्चें ममत्व को खोकर करते है। जिससे उनका संपूर्ण जीवन संकुचित मानसिकता और आत्मविश्वास के क्षय के रूप में परिणत होता है। अन्त बेहद निजी भावनाओं के दमन और उनके अभाव में गलत लोगों और शौक का प्रादुर्भाव जीवन का अन्त कर देता है। कूल अंदाज, चिल्ड मिजाज, दुनियां में दम मारों और जियो’ की विचार धारा परिवारों को पतन और नशे की तरफ धकेल रही है । निश्चित तौर पर यह भारतीयता से दूर और आधुनिकता की ओर जाने का ही परिणाम है।

5. पारिवारिक कलेश- जीवन मूल्यों का अभाव परिवार में हमेशा रहने वाले तनाव और अवसाद का कारण बनता है जिसकी परिणति एक विकृत मानसिकता और नशे के अवलम्बन के तौर पर होती है।

6. बाल मानसिकता पर भावनात्मक चोट- बच्चों के सर्वागीण विकास के लिए शिक्षा के साथ- साथ परिवार और उत्तम परिवारिक स्थितियों का होना जिसमें आदर्श परिवार, संस्कार आदि बहुत महत्वपूर्ण होते है इनके अभाव में बाल मानसिकता पर एक गहरी चोट पडती है और वह गहरी ऋणात्मकता की तरफ नशे/धुंए की चुम्बकीय जाल में फस जाते है।

7. गलत परंपराओं /आदतों का निर्वहन- वर्तमान परिपेक्ष्य में प्राकृतिक जीवन शैली परंपराओं और संस्कारों के प्रति उदासीनता और उनकी जगह गलत परंपराए और उनके निर्वहन के नाम पर केवल आकर्षण लेकिन खोखली और दंभ जनित प्रदर्शन की मानसिकता और जीवन शैली एक भोग विलासी व्यक्तित्व का सृजन करत हैं जिससे कूल मिजाज नशे का अंदाज दम मारो और जिओ की प्रवृति, धुएं में दम घोटते जीवन की सच्चाई को वयां कर देती है और ‘युवा धन’ वही पर दम तोड देता है।

अतः आवश्यक है कि बदलते परिदृश्य में भी पारिवारिकता, संस्कार ,स्नेह भरा समय व साथ सबके लिए और जुडाव का पारिवारिक गृहस्थ ढांचा अभिभावकों से उनके युवाओं को मिलता रहे और जीवन में उत्साह ऊर्जा , रचनात्मकता और जीवंतता एक अकाट्य सत्य की तरह प्रस्फुटित होती रहे।

 

आलेख द्वारा अमित तिवारी

सहायक आचार्य

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान ग्वालियर

(पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार का एक स्वायत्त निकाय)

 

दिनांक 01.10.2020

चित्र आधारित स्वरचित रचना “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’

  चित्र आधारित स्वरचित रचना     “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’ ग्वालियर, भारत ; 30.06.2023   ...