बुधवार, 18 नवंबर 2020

कमाई एक अतुकान्त स्वरचित कविता द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘ ग्वालियर म.प्र.

 

कमाई

एक अतुकान्त स्वरचित कविता

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘

ग्वालियर म.प्र.

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जीवन और कमाई ,

छोटी छोटी पाई,

मेरे घर में आई,

श्री थी तब मुस्काई,

पर थी वो सकुचाई,

देखके मुठ्ठीभर की पाई ।

 

आशाओं का आकाश अनंत,

इनका कहॉ होता है अंत,

कैसे हो फिर आशाएं शांत,

करता मन विचार एकांत,

पाया खोया इच्छा जनित तंत,

मेरी छोटी कमाई और आशाएं अनंत।

 

कैसे मेल करू मैं इनमें ,

इनसब में होता ना साम्य सच्चे अर्थों में ,

जीवन की हर जरूरत में,

लेन-देन और जीवन के व्यापार में,

प्यार परवरिश मान-सम्मान में,

हो दुकान या कि मकान में ...

 

आती काम केवल कमाई,

होता बहुत अधूरा बिन कमाई,

हर जीवन का हर काज़ है, हाय कमाई…

तेरी कमी किसी को रास न आई,

जीवन में खुशियों का पर्याय कमाई,

सिर्फ कमाई,

धन की इज्जत की या निष्ठा की हो वो कमाई।

 

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘

ग्वालियर म.प्र.

दिनांक- १८.११.२०२०

बुधवार, 11 नवंबर 2020

रोशनी एक स्‍वरचित अतुकांत कविता द्वारा अमित तिवारी ‘शून्‍य’ ग्‍वालियर मप्र

  रोशनी

एक स्‍वरचित अतुकांत कविता

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्‍य’

ग्‍वालियर मप्र

 

रोशनी नाम है मन के उजालों का,

कभी अपनों से दूर जाकर भी अपना फर्ज निभाने का,

रोशनी नाम है दिल खोलकर मुस्‍कुराने,

और ठहाके लगाकर जिन्‍दगी को गुदगुदाने का,

बैठे हुए दिलों में जिन्‍दगी के रंग भरने का,

और उड़ते हुए रंगों को रंगीन करने का,

ये नाम है अपनी भूख बॉट,

किसी और की भूख मिटाने का,

यह नाम है खुद पर हस औरों को गुदगुदाने का ,

मुफ़लिसी के कई आलम होगें मग़र ,

उसमें भी अपनी खुदी से रईसी दिखाने का,

रोशनी ज़ज्‍बा है फितरते मोहब्‍बत निभाने का,

उड़ी हुई नींद से खुद सो जाने का,

रोशनी नाम है गैर की तरक्‍की पर मुस्‍कुराने का,

रोशनी का नाम है श़म्‍मा जला वीराने मन को जगाने का,

रोशनी नाम है इल्‍म का ,

जहॉ में इल्‍म की इब़ादत कर हरेक को पढ़ाने का,

रोशनी नाम है मोहब्‍बत कर खुद ही से,

जहॉ को एक हुनरमंद मय्यस्‍सर कराने का,

रोशनी नाम है दिवाली की टूटी आस में,

डूबे घर को रोशन कर जाने का,

किसी बुझे चूल्‍हे को फिर से जला रोटियां पका,

पाने का हुनर दिला पेट की भूख मिटाने का

 

 

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्‍य’

ग्‍वालियर मप्र

दिनांक ११.११.२०२०

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

दीपोत्सव स्वरचित लघुकथा द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य’ ग्वालियर मप्र

 दीपोत्सव

स्वरचित लघुकथा

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य’

ग्वालियर मप्र.

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लाजपत नगर मार्केट में ढाबे से खाना खाकर अमित जल्दी जल्दी तेज कदमों से आफिस में वापस आया।वापस आने पर रोज की तरह आज आफिस में साथी सहकर्मी नही दिख रहे थे; मैनेजर साहिबा ने पूछा आज  तुम जल्दी लंच करके आ गए? क्या बात है! अमित ने सामान्य लहजे में मैनेजर को जबाव दिया और अपने काम में लग गया और अपनी फाइले और टुअर की सारी रिपोर्ट्स वगैरह को निबटाकर तय समय पर कार्यालय से निकलने के लिए खडा हुआ। तभी उसमें अपने मेज के नीचे से बडा ट्राली बैग खीचा और मैनेजर की कैबिन की तरफ आगे बढ़ा। कैबिन के बाहर से दरवाजे पर नॉक करते हुए, दबे हुए शब्दों में अंदर आने की अनुमति मांग, मैनेजर साहिबा के सामने कैबिन में रखे सोफे पर बैठ गया। और मैडम के फ्री होने का इंतजार करने लगा। तभी मैडम ने बडे आश्चर्य से पूछा- अरे अमित इतना बडा ट्राली बैग लेकर क्यों आए हो! अमित ने जबाव दिया कि मैं, दीपोत्सव मनाने घर जा रहा हॅू मैने इसके लिए 10 दिन पहले छुट्टी का आवेदन स्वीकृत करा लिया था। आज दो घण्टे बाद निजामुद्दीन स्टेशन से मेरा रिज़र्वेशन है। सुनते ही मैनेजर साहिबा बोली - अरे हॉ याद आया तुमने आवेदन दिया था, तो दीवाली की शुभकामनाएं देने आए हो ...उनके ऐसे वक्तव्य को सुनकर  अमित ने बिना बोले स्वीकृति दे दी जिसके जबाव में मैनेजर साहिबा ने कहा पर इतनी बडी ट्राली क्यो? थोडा असहज होते हुए अमित ने जबाव दिया पूर 1 साल बाद घर जा रहा हॅू और नौकरी लगने के बाद यह मेरी पहली दीवाली है, इसलिए सबके लिए दीपोत्सव के त्यौहार को मनाने के लिए छोटे-छोटे उपहार ले जा रहा हॅू। अमित की बात सुनकर मैनेजर साहिबा के चेहरे पर भावुकता झलक आई ओर भरे गले से अमित को दीपोत्सव की शुभकामनाएं देती हुई बोलीं- इतने दूर रहकर भी परिवार के बारे में सोचते हो ये निश्चित तौर पर परिवार और तुम्हारी आत्मीयता का परिचायक है। इतने व्यस्त समय में भी अकेले इतने सारे उपहार खरीदना, ले जाना और सबके बारे में सोचना, यह तुम्हारे दीपोत्सव के प्रति परंपराओं के निर्वहन और उन्हेा बनाए रखने के तुम्हारे पारिवारिक संस्कारों को दर्शाती है। घर पर जाकर बडों को मेरा प्रणाम और दीपोत्सव की शुभकामनाएं देना । ‘’हॉ और फोन स्विच आफ मत करना……………’’ , दीपोत्सव के बाद बहुत सारे टुअर फाइल्स् हमें मैनेज करने है। जरूरत पड़ी तो मैं तुमसे फोन पर बात करती रहूगी। ऐसा कहकर टेबल पर पड़ी डिजीटल घण्टी बजाकर ड्राइवर रमेश को बुलाया और उसे अमित को खुद की कार से निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन छोडने का इशारा किया । अमित थोडा सकुचा फिर चुपचाप मैनेजर साहिबा के भावुक चेहरे को देखकर सिर हिलाकर धन्यवाद देते हुए उन्हे दीपोत्सव की शुभकामनाएं देते हुए बाएं हाथ से ट्रॉली खीचते हुए कमरे से बाहर आ गया।




द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य’

ग्वालियर मप्र.

दिनांक - 10/11/2020

सोमवार, 9 नवंबर 2020

स्‍वागत है पर्यटन जगत में एक स्‍वरचित अतुकान्‍त कविता अमित तिवारी ‘शून्‍य’ सहायक प्राध्‍यापक – भा.प.या.प्र.सं. ग्‍वालियर (मप्र)

 

स्‍वागत है पर्यटन जगत में

एक स्‍वरचित अतुकान्‍त कविता

अमित तिवारी ‘शून्‍य’

सहायक प्राध्‍यापक – भा.प.या.प्र.सं.

ग्‍वालियर (मप्र)

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हो रहा है मिलन हार से जीत का

खिल रहा है सबका मन सुनके संगीत पर्यटन का

खोल बांहे आवाहन कर रही हैं दिशाएं

गीत क्‍या राग क्‍या, क्‍या ही होते हैं स्‍वर

 

निर्झरी सी रही ह्रदय की घुमक्‍कड़ी

देशाटन ही नही, पर्यटन ही सही

पर्यटन न सही, तीर्थाटन ही सही

तीर्थाटन न सही, मन का आवंटन सही

 

कोरी प्रकृति की कोरी अट्टालिकाएं बुलाती हमें

हम फिर भी जो न जाएं तो क्‍या फायदा

वे तो करती हमारा ह्रदय से स्‍वागतम्

देखो अपना सा देश, देख लो मेरा देश

हॉ चलो- ‘देखो अपना देश’

 

कह रही हैं दिशाएं स्‍वागतम् स्‍वागतम्

स्‍वागतम् आगतम्, आगतम् जीवनम्

स्‍वागतम् पर्यटन की धरा सुन्‍दरम्

 

शैल देखो कभी, देख लो नद्य भी

देखो जितना लगे मोहक मन को सभी

 

स्‍वागतम् जिन्‍दगी पर्यटन की धरा

स्‍वागतम् पर्यटन के लिए जिन्‍दगी

बन सको तो बनो सांकृत्‍यायन भी कभी

स्‍वागत तो करो पर्यटन का भी

जिन्‍दगी में बनके यात्री कभी कभी

 

अमित तिवारी ‘शून्‍य’

सहायक प्राध्‍यापक – भा.प.या.प्र.सं.

ग्‍वालियर (मप्र)

दिनांक – ०९-११-२०२०

रविवार, 8 नवंबर 2020

चित्रलेखन आधारित श्रंगार रचना प्रेम की अविरल नैय्या में स्वरचित द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

 


चित्रलेखन आधारित श्रंगार रचना

प्रेम की अविरल नैय्या में

स्वरचित द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर म.प्र.

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प्रेम की अविरल नैय्या में

तुम बन प्रीत चली आओ

मैं तुमको पा जायुं यूँ

की तुम मैं हम बस हो जायें

नेह की पीड़ा को धड़कन में

लेकर बस खो मैं जाऊं

 

वैरागी मन में अनुराग जगा

सिरहन सी तुम गुम होती हो

साया तेरा मैं पा न सका

तेरी मेरी कुछ भूल रही अक्सर

यद्यपि अक्षुण्ण रही प्रीत मेरी

तुझमे बस बसती जान मेरी

लेकिन बस काया का यह नेह नहीं

यह आत्मा का अनुपम नाता है

हो सकता है तेरे प्रेम का

न उत्तर मुझको देना आता हो

पर खरी प्रीत का नायक हूँ

हाँ अपनी धुन का वाहक हूँ

पर तुझ पर ही वारा जाता हूँ

तुझसे मिल पूरा सा हो जाता हूँ

हो जीवन संगिनी तुम

प्रेम सरिता, ज्योति सी

जलती हो ‘दीपा’

 

स्वरचित द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र

गुरुवार, 5 नवंबर 2020

पत्रकारिता बनाम विद्वेष की स्तिथियाँ – पत्रकारिता के लिए संघर्ष की समीक्षा- फिर क्यों बने कोई पत्रकार की भावना की समीक्षा एक आलेख द्वारा अमित तिवारी सहायक प्राध्यापक भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान ग्वालियर

 

पत्रकारिता बनाम विद्वेष की स्तिथियाँ –

पत्रकारिता के लिए संघर्ष की समीक्षा- फिर क्यों बने कोई पत्रकार की भावना की समीक्षा एक आलेख

द्वारा अमित तिवारी

सहायक प्राध्यापक

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान ग्वालियर

 

(पर्यटन मंतालय का एक स्वायतत्त साशी संगठन )

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भारतीय परिदृश्य में पत्रकारिता सामाजिक परिपेक्ष्य में सेवा आधारित विषय रहा है। जो कि लोकतंत्र की- ‘जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा की अवधारणा’ पर आधारित एक मूलभूत सिद्धान्त- शासन, समाज, हितधारकों, वर्ग, जातिगत मामलों, एवं समग्र मानवता के हित हेतु समुचित विषयक उन्नयन हो एक महत्वपूर्ण स्तिथि रही है; सम्प्रेषण शैली द्वारा सुस्पष्ट एवं सप्रमाण साक्ष्यों को समेटते हुए एक नवीन सामाजिक आवश्यकता जिसे -ख़बर या समाचार के नाम से जाना जाता है समयोचित विषयों को लिपिबद्ध या वाणीबद्ध करते हुए न्यूनतम शब्दों में आकर्षक शैली में पाठकों या दर्शकों को प्रस्तुत किया जा सके। यद्यपि इस विधा की आवश्यकता सामाजिक जगत में बहुत पहले से रही है लेकिन प्रामाणिक तौर पर यह कागज़ के आविष्कार और विशेषकर प्रेस के आने के बाद यानि छापा खाना के उद्भव के बाद देखा और सुना गया है और ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में 16 वी शताब्दी ई. के उत्तरार्ध में इसके यूरोप में छपने की प्रथम घटना ऐतिहासिक कालखण्ड में दर्ज है। यह लैटिन शब्द जर्नल से ओतप्रोत होते हुए अपभ्रंश में फ्रेंच के जुगनाल के समीप का है। जिसे अंग्रेजी में प्रत्यय (+ism) के साथ समायोजित करने पर जर्नलिस्जम शब्द का उद्भव हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ विषयवस्तु की खोज कर उन समस्याओं पर शोध कर निष्कर्ष स्वरूप संपूर्ण विषय की समीक्षा कर एक नई जानकारी स्वरूप में प्रस्तुत करने की होती है। कालान्तर में ख़बरों को गढने या जानकारियों को ज्ञापित करने के पूर्व उनके विषय में शोध परक प्रयास द्वारा उनके विषय में सूचनाए जुटाकर विधिवत प्रमाणिकता की परख के बाद लिपिबद्ध किया जाता है जिसे संपादन कला के उपरांत प्रकाशित व संदर्भित किया जाता है।

यद्यपि आज के परिदृश्य में पत्रकारिता इलेक्ट्रोनिक माध्यमों के प्रश्रय में रहकर सूचना के विस्फोटक आदान प्रदान पर आकर आज एक नई पत्रकारिता जिसे इलेक्ट्रोनिक मीडिया कहते है का स्वरूप ले चुकी है। जर्नल्ज़िम के स्वर्णिम इतिहास से होते हुए युगान्तर की सचेत कल्पनाओं और कल्पनाशीलता के प्रश्रय पर आज खोजी पत्रकारिता से पत्रकारिता और पत्रकारिता से पीत पत्रकारिता होकर भी रह गई है हालाकि पत्रकारिता या मीडिया को संविधान में विधायका, न्यायपालिका व कार्यपालिका के बाद चैथे स्तंभ के तौर पर देखा जाता है।

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन और उसकी आगे की खेप की पत्रकारिता या कि मीडिया निरंकुश  शासन को नियोजित करने एवं स्वराज्य और संविधान की रक्षा करने की एक महत्वपूर्ण कड़ी रही है। यद्यपि 70 के दशक में सरकारों के निरंकुश होने और एक अनचाहे आपातकाल के देश में निवेश के द्वारा पत्रकारिता या उस संघर्ष को जिसमें शासन के खिलाफ आँखों में आखें डालकर लोकतंत्र और लोक-हित की रक्षा का एक महत्वपूर्ण प्रश्रय छिपा रहा हो। ऐसे सर्वकालिक पत्रकार समाज व राष्ट्रहित के मुख्यवाहक माने जाते रहे हैं।

 

बदलते परिदृश्य में भारत में स्वतंत्रता के बावजूद व्यक्ति के मौलिक हितों जिसमें बोलने और लिखने का अधिकार होता है को दरकिनार कर जब शासन द्वारा दमन की नीति के तहत पत्रकारिता को दबाया जाता है तो फिर वर्ग संघर्ष या निम्नतम परिपाटी पर जी रही गरीब श्रेणी के लोगों के हित को साधना असंभव हो जाएगा; साथ इस आदर्श कार्य को जिस संघर्ष से वेतनिक अथवा अवेतनिक होकर समाज हित में लेखनी के पुजारी करते आए है उसे कर पाना मुश्किल होगा। बीते दिन की घटना निहायत ही आपत्ति जनक एवं अमानवीय है यद्यपि व्यापारिक परिपेक्ष्य अलग हो सकते हैं किन्तु दमन तो केवल दमन है और गलत केवल गलत है; के परिपेक्ष्य में राष्ट्र के मीडिया बन्धुओं को जो हालाकि इस घटना के विरोधी या कि समर्थक हो सकते हैं; को भी इस वीभत्स घटना की निंदा और पुलिसिया क्रूरता और शासन की खुद पर उंगली उठाने वाले पत्रकार के खिलाफ तंत्र को इस्तेमाल करने की नीति है, निहायत शर्मनाक और अमानवीय है। इतिहास में इस तरह के वाकिए अगर फिर से दोहराए जाएगें तो इतिहास उन मीडिया मित्रों को मिटते देखेगा जो आज इस घटना का समर्थन कर रहे है। सच ही है गलत तो केवल गलत ही होता है और अगर यह सही है तो फिर पत्रकारिता के लिए संघर्ष झूठ है और फिर क्यों कोई सच्चा पत्रकार बनेगा।शर्मनाक, सोचनीय व निंदनीय।

 

द्वारा अमित तिवारी

सहायक प्राध्यापक

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान ग्वालियर

(पर्यटन मंतालय का एक स्वायतत्त साशी संगठन)

शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

“हाथ बढ़ा कि फिर दिन निकला” चित्र लेखन पर स्वरचित अतुकांत कविता द्वारा अमित तिवारी “शून्य” ग्वालियर , मप्र.

 

“हाथ बढ़ा कि फिर दिन निकला”

चित्र लेखन पर  स्वरचित अतुकांत कविता

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , मप्र.

 

ये दोस्त मेरे,

हो साथ तेरे,

मेरे जीवन की पतवार,

बन सकूँ बड़ा,

हो सकूँ खड़ा,

थाम लेना मेरा हाथ,

की देना साथ मेरा,

कि सूरज फिर निकला है,

पर लक्ष्य अभी तो पाना है,

हमने भी जीवन में कुछ ठाना है,

 

पर लक्ष्य हमेशा संगठन गढ़े,

होते हैं ; पाए जाते हैं ; जो की हों अड़े,

निर्लिप्त बहुत जीवन मेरा,

उसमे एकांत का भाव पूरा,

लेकिन दिन की बेला में बढ़ता,

घटता , गिरता चलता फिर रुकता,

मैं भी यूँ ही बढ़ता जाता हूँ,

फिर कदम से कदम तुझ से मिलाता हूँ,

लक्ष्य पर टिका राम धुन गाता हूँ,

 

सूरज शिखर का ओज बता,

बढ़ रहा विवर की खोज जता,

लेकिन जीवन चलने का नाम,

और न कोई मुझको काम,

मैं चलूँ दिवा,

मैं चलूँ निशा,

मैं चलता हूँ पथ पर अडिग-अविराम;

बस तुम हाथ बढ़ा दो,कि दिन निकला;

ताकि दिन में ही लक्ष्य मिले;

संघर्ष की बेला अब कुछ सिमटे;

 मेरे जीवन की कीर्ति पके;

मुझे नया कुछ सृजन मिले;

 

यह दोस्त मेरे,

हो साथ तेरे,

मेरी जीवन की पतवार,

बन सकूँ बड़ा,

हो सकूँ खड़ा,

थाम लेना मेरा हाथ,

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , मप्र.

01.11.2020

 

चित्र आधारित स्वरचित रचना “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’

  चित्र आधारित स्वरचित रचना     “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’ ग्वालियर, भारत ; 30.06.2023   ...