गुरुवार, 23 सितंबर 2021

आलेख पूर्वजों की स्मृति में किये गए श्राद्ध का महत्व द्वारा अमित तिवारी ; सहायक प्राध्यापक भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान ग्वालियर , भारत

 

आलेख

पूर्वजों की स्मृति में किये गए श्राद्ध का महत्व

द्वारा  अमित  तिवारी ; सहायक प्राध्यापक

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान

ग्वालियर , भारत

 

 

श्राद्ध , भारतीय जीवन दर्शन  परंपरा में मनुष्य का अपने स्वयं की उत्पत्ति के कारक – पितरों, जिनके  द्वारा प्रत्यक्षतः और अप्रत्यक्ष उसकी उत्पत्ति हुई है ‘ की उपासना और उन्हें तर्पण कर उनको याद कर आशीष लेने की वैज्ञानिक परंपरा है | श्राद्ध पक्ष प्रायः भारतीय हिन्दू मास आश्विन की पूर्णिमा उपरांत कृष्ण पक्ष में अमावस्या तक मनाया जाता है | प्रायः यह  वे तिथियाँ हैं जिनमें कुल  या परिवार के पितर अवसान को प्राप्त हुए होते हैं | अतः उनके लिए किया गया श्राद्ध उनको पूजने का फल देता है और वे आशीर्वाद दे कुल के वर्त्तमान मुखिया और परिजनों का मंगल करते हैं | इन पंद्रह दिनों में क्रमशः उनकी स्मृति में प्रत्येक हिन्दू परिवार का मुखिया अपने कुल की ओर से पितरों को तर्पण करने हेतु जल का अर्घ्य देता है | घर की देहरी पर लेपन कर महिलाएं अपने कुल की परंपरा के अनुसार भोजन बना घर के मुखिया से होम करवा ब्राह्मण और उससे पूर्व गौ का भोजन करवाती हैं साथ में दान का भी महत्व है | सर्व पितृ अमावस्या का दिन इन सब तिथियों में एक विशेष फल देने वाला है ; जिसमें  उन सब पितरों जिनकी हमे विस्मृति हुई है या जिन्हें हमने कभी देखा या जिन के विषय में कभी सुना नहीं की भी तृप्ति होती है और वे सब हमे यानी अपनी इस  नयी पीढ़ी को आशीष देकर उनकी रक्षा करतें हैं | यदि वैदिक साहित्य या की लोक पद्धति को माने तो ज्ञात होगा की श्राद्ध पक्ष वस्तुतः ईश्वरीय स्तुति और मनुष्य के बीच का अनाहात द्वार है और यही भारतीय परंपरा है जिसमें देव और पितृ एक समान होते हैं | पितरों को नमन |     


द्वारा  अमित  तिवारी ; सहायक प्राध्यापक

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान

ग्वालियर , भारत

 

बुधवार, 22 सितंबर 2021

पंक्ति पर काव्य पंक्ति : दिल ने दी आवाज़ तुम्हें द्वारा अमित तिवारी “शून्य” ग्वालियर ; भारत

 

पंक्ति पर काव्य

पंक्ति : दिल ने दी आवाज़ तुम्हें

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर ; भारत

 

 

अकसर दिल में छिपाने की खलिश रहती है

हाँ कहे देती हूँ कि दिल ने दी आवाज़ तुम्हें है |

 

बनने और बिगड़ने के मानिंद जिन्दगी थी

हाँ रो लेती हूँ थोडा कि दिल ने दी आवाज़ तुम्हें है |

 

लफ्जों को कहाँ तक कोई संभालेगा यादों तले

हाँ सजदा किया करती हूँ तुम्हारा कि दिल ने दी आवाज़ तुम्हें है |

 

मिट जाता नहीं कोई यूँ ही जहाँ में किसी पर

हाँ होती है टीस की दिल ने दी आवाज़ तुम्हें है |

 

संभव नहीं था  छु लेती तुम्हारे रगों की खुश्बू जरा सी

हाँ जानती हूँ तुम भी बड़े इत्रो-आब हो गए कि दिल ने दी आवाज़ तुम्हें  है |

 

सरगोशी या ख़ामोशी दिल में भी है जुबां पे भी

देखती हूँ की तुम कुछ बदले से हो कि दिल ने दी आवाज़ तुम्हें है |

 

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , भारत

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

तपस्या स्वरचित लघुकथा द्वारा अमित तिवारी “शून्य” ग्वालियर , म.प्र.

 

तपस्या

स्वरचित लघुकथा

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र.

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गौतम ने अपने पिता जी आज फिर  से बात करनी ही चाही थी| पर  आज भी पिता जी अपने पूर्व के तय कार्यक्रमों में व्यस्तता के कारण; पहले ही निकल गए | गौतम आज तकरीबन एक साल से अपने मन की बात को उन्हें न बता पाने के कार बहुत असहज महसूस कर रहा था | आज उसने हिम्मत करके अपने पिता जी की जगह माता जी को वो बात बता ही दी | माँ उसकी बात सुनकर मानो अपने बेटे की गुमनाम हो कर   की गई तपस्या पर मानो फूली नहीं समा रही थी | आखिर उसे यकीन नहीं हो पा रहा था की क्यूँ गौतम को वो दोनों समझ नहीं पा रहे थे | वो तो आज जब उसने अपने मन की बात माँ को बताई कि मैंने कई दिनों की मेहनत से यू टयूब पर एक चैनल बनाया है | अब  जिसके एक  लाख सब्सक्राइबर हो गए हैं | आज इसी की वजह से बाहरी दुनिया में लोग उसे जानने लगें हैं और इज्ज़त भी देने लगें हैं |पांच दिन पहले उसे यू टयूब की तरफ से  पहली कमाई के तौर एक लाख रुपये उसके बैंक अकाउंट  में मिले हैं | जिसे वो चैक के रूप में  कई दिनों से पापा को देना चाह रहा था | उसने यह सब बात बता कर माँ से कहा आप ही पापा को यह सब बता देना और ऐसा कह कर अपना लैपटॉप बैग और कैमरा वगैरह लेकर घर से अपना स्कूटर लेकर  चला गया | उमा आज भरी लेकिन ख़ुशी  के आंसू लिए अपने बेटे की इस गुमनामी में की गई तपस्या के लिए उसे मन ही मन आशीष दे रही थी और इश्वर को उसकी तपस्या को सिद्ध करने के लिए धन्यवाद भी  दे रही थी |   

 

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र.

सोमवार, 20 सितंबर 2021

विसर्जन एक अतुकांत कवित्त द्वारा अमित तिवारी “शून्य” ग्वालियर , भारत

 

विसर्जन

एक अतुकांत कवित्त

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , भारत

 

विसर्जन विचारों के मैल का

    विचारों के मैल को गला करो विसर्जन

        कर पाने को नव सृजन

           पुनर्निर्माण मन - मस्तिष्कों का

 

विसर्जन स्वार्थ की मद में गहरे होते

                कुसंस्कारों की बेल का विसर्जन

                                ताकि नवांकुर हो सकें वहां

                                                                नवीन और परिपुष्ट विचारों का

 

 

                                                                                                                विसर्जन आलस्य की बीज रूपी

                                                                                                                                प्रथाओं और पाखण्ड का विसर्जन

                                                                                                                                                तब जागेगा नव प्रभात और

                                हो जायेगा पुनुरुथान मानवता का ||

 

 

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , भारत

 

रविवार, 19 सितंबर 2021

“जीवन का ताना-बाना” स्वरचित अतुकांत कविता द्वारा- अमित तिवारी शून्य ग्वालियर मप्र

 

“जीवन का ताना-बाना”

स्वरचित अतुकांत कविता

द्वारा- अमित तिवारी शून्य

ग्वालियर मप्र

 

 

 

जीवन के ताने-बाने में

कुछ खोने में कुछ पाने में

 

जीवन एकमत कभी रहता नहीं

कभी शीर्ष पर कभी गर्त में

 

कभी प्रेम भरा सा कभी रिक्त

कभी मुक्त उन्मुक्त और विरक्त

 

जड़ चेतन में उलझा नितान्त

सदा रहता निज मन प्रेरित कुछ क्लांत

 

लाभ हानि यश अपयश के माने

हैं जीवन में मनुष्य के ताने बाने

 

हठ करता कीर्ति की और रहता सदा उदास

कंटक बोता और होती कंचन की उसको आस

 

समझो ये तो यूं ही चलता रहेगा

ताना बाना बना कर कर्म तुझे धुनता ही रहेगा

 

कहें शून्य यह भाव जीवन का सच ही है

उसका ताना बाना, जीवन को यूं जानना।

 

द्वारा अमित तिवारी शून्य

ग्वालियर ,भारत

 

बुधवार, 1 सितंबर 2021

उनसे मुलाकात होना स्वरचित अतुकांत कविता द्वारा अमित तिवारी “शून्य” ग्वालियर , म.प्र.

 

उनसे मुलाकात होना

स्वरचित अतुकांत कविता

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र.

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मिलते नहीं थे जो मुझे कभी

आज उन बिसाले सनम से

राह में उनसे मुलाक़ात हो गई

जो हम नहीं चाहते थे

आज उनसे वही बात हो गई |

 

जुल्मो सितम से था भरा

जिनका रवैया मेरी तरफ

न जाने फिर भी क्यूँ उनसे मुलाक़ात हो गई

राह में उनसे मुलाक़ात जो हो गई

अश्कों से धुल गए वो घाव

और शब्दों से बात न हो सकी |

 

गहरे थे वो जख्म; जिनकी

रुस्वायिओं के नाम से

वो एकतरफा मुलाक़ात में

आज अंजाम और तमाम  हो गई

यूँ ही  राह में उनसे मुलाक़ात हो गई |

 

हाँ बेवफाई धर्म था

उनका हरेक दौर में

लेकिन था नागवार जिनको मिलना

उनसे आज फिर यूँ ही

राह में उनसे मुलाक़ात तो हो ही गई |

 

 

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर ; म.प्र.

 

 

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

लघु कथा : राह स्वरचित (मौलिक ) द्वारा अमित तिवारी “ शून्य” ग्वालियर म.प्र.

 

लघु कथा : राह

स्वरचित (मौलिक )

द्वारा अमित तिवारी “ शून्य”

ग्वालियर म.प्र.

31.08.2021

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आज सुबह से ही मानसी बहुत जल्दबाजी में अपने रूटीन से अलग कुछ बदली हुई सी प्रतीत हो रही थी | जीवन में नाकामियों की राह के लिए उत्तरदायी उसकी आदतों को उसने सुबह की नयी किरणों के साथ ही जैसे बदल लिया था  | हाँ; चेहरे के भाव जो कभी बहुत कैजुअल और मोहब्बत के मंसूबों के इर्द -गिर्द रहा करते थे ; आज जैसे विशाल के सच और उसे लेकर उसकी  राय के साथ ही काफूर हो गए | जो बीती रात में विशाल के हॉस्टल गेट पर उससे मिलते जाते पता चली ; जहाँ विशाल नशे के हाल में विडियो कॉल पर नेहा के साथ बात कर रहा था और  कॉल ख़त्म होते ही और पास ही में खड़े उसके रूम मेट अजय ने  उसे समझाया “अरे विशाल यह सब क्या है ;फिर मानसी को क्यों तुम....” तभी विशाल ने बड़ी मादक आवाज़ में अजय से कहा यार तुम क्या जानो यह लड़कियां सीधी- सच्ची राह छोड़ कर मेरे जैसे लड़के को क्यों पसंद करती हैं ? ...अरे करती हैं तो करें मेरा क्या ? मैं तो इस राह पर चल कर जिन्दगी की मौज ले रहा हूँ ...मेरे भाई और रही बात नेहा की या मानसी की तो यह तो अभी नयी हैं | अपुन का याराना तो बहुत पुराना है और अपना फंडा बहुत क्लियर है की जो अपुन को चाहिए वो अपुन करेंगे ...” इतना सुनते ही मानसी ने बीच में टोकते हुए कहा तो अब मैं तुम्हारे बारे में क्या सोचूं ? हतप्रभ रहे विशाल ने थोडा सकपकाते हुए ...”.तू... मेरे बारे जो भी सोचे मैं तो बस यही सोचता हूँ जो अपुन को मौज दे वही मेरी राह है ,बाकी तुझ जैसी लड़कियों को विशाल घास भी नहीं डालता !”  इतना सुनकर रुआंसी हुई मानसी अपने हॉस्टल की तरफ तेजी से बढती चली गई और अपनी विंग और कमरे में पहुँच कर जल्द ही अपना कमरा बंद कर घंटों रोती रही  | आधी रात तक रोते हुए भी उसे नींद नहीं आई  ,तभी  देर रात को उसने अपनी रूम मेट रुमा जो बगल वाली बालकनी में टेबल लैंप की रौशनी में पढ़ रही थी ; को रुंधे स्वर में आवाज़ लगाई | रुमा कमरे में आ गई और मानसी की सारी बात सुनी और बड़ी तसल्ली से मानसी से बोलीं कि मानसी भला हुआ तुम यह बात जान गई | वैसे इस सबमें मुझे विशाल के बारे कोई बात नहीं कहनी है ...न मैं उसे जानती हूँ न जानना चाहती हूँ....लेकिन मैं बस इतना समझती हूँ और तुम्हे भी एक दोस्त के नाते समझाना चाहती हूँ कि “ बीता समय वापस नहीं आता...जब हम लोग घर से इस शहर की राह पर निकले थे .. तो वो राह हमारे माँ बाप ने हमे हमारे सपने सच करने के लिए दिखाई थी ...और हमसे उम्मीद भी  की थी की हम अपने सपनो की राह पर ही चलेंगे ...लेकिन अगर हम अपने सपनो की राह को इस तरह सिर्फ थोड़ी सी  आज़ादी के लिए बदलेंगे तो यकीनन ....विशाल ही  क्या, कोई भी सख्श ही  क्या हम ही हमे हमारे सपनो की राह से दूर चले जायेंगे|  जिनको हांसिल करने के लिए मैं और तुम इतनी तुम इतनी दूर इस शहर में आये हैं | मुझे तुम्हारी निजी जिन्दगी से कुछ भी लेना देना  नहीं है | लेकिन एक सच यह भी है की विशाल को तो उसकी राह शायद पता है; लेकिन तुम जैसी हजारों लड़कियों को शायद अपनी राह ही नहीं मालूम , खेर अब भी देर नहीं हुई है अपनी जिन्दगी में राहों को बदल कर उन्हीं राहों पर चलो जिस पर चलकर तुमने तुम्हारे सपने बुने थे | अपना चेहरा धो लो ;रात बहुत हो गई है अब सो जाओ मैं अपना पेपर पूरा करना चाहती हूँ |” इतना कह कर रुमा वापस बालकनी में चली गई और अपनी पढाई में लग गई | रुमा की बात सुनकर मानसी को एहसास हुआ की उससे क्या छूटा और उसे कैसे वापस अपने सपनो की राह को वापस पकड़ना होगा | रात ज्यादा हो गई थी दिल में खुद को लेकर बहुत सारी ग्लानि के साथ चेहरा धोकर बत्ती बन्द् करके एक नयी सुबह और नयी राह की तलाश में वो सो गई ;एक सही और नई राह  तक पहुँचने के लिए |  

 

सोमवार, 30 अगस्त 2021

कृष्ण सत्य हैं स्वरचित मौलिक अतुकांत कवित्त द्वारा अमित तिवारी “शून्य” ग्वालियर , म.प्र

 

कृष्ण सत्य हैं

स्वरचित मौलिक अतुकांत कवित्त

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र.

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कृष्ण सत्य का रूप हैं

ज्ञान की धूप हैं

प्रेम का राग हैं

धरम का मर्म हैं

मोक्ष का द्वार हैं

गीता में काव्य हैं

ईश् में इंद्र हैं

प्रेम का केंद्र हैं

धर्म का मूल हैं

गौवंश ग्वाल हैं

रक्त में लाल हैं

द्रौपदी चीर हैं

कृष्ण युगवीर हैं

 

कृष्ण सारथ्य रूपपथ प्रदर्शक भी है

सत्य का रूप युगदृष्टा भी हैं

कृष्ण रुक्मणि भाल हैं

वो सुदामा सहोदर सखा राम रूप हैं

वे मुझ में भी हैं

और तुझमें भी हैं

वो मंदिर में भी हैं

और हरेक दिल में भी हैं

गोपिका के लिए

वो मधुवन में हैं

वे अर्जुन सखा

युग समन्वयक भी हैं

भारतवर्ष की राजनीती का धुरंधर भी हैं

परन्तप का विश्वास और उनका नेह हैं

वे सरल हैं कभी

और कभी गरल भी तो हैं

वो जटिल कंस से

चाणूरमर्दन भी हैं

 

क्यूँ ना कह दे कृष्ण सत्य हैं  जगद्गुरु हैं

हां कृष्ण सत्य का रूप हैं

हाँ कृष्ण सत्य का रूप हैं ||

स्वरचित मौलिक अतुकांत कवित्त

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र.

 

रविवार, 29 अगस्त 2021

युग्म शब्द आधारित काव्य रचना “जाना- पहचाना” द्वारा अमित तिवारी “शून्य” अतुकांत कविता

 

युग्म शब्द आधारित

काव्य रचना

“जाना- पहचाना”

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

अतुकांत कविता

 

कौन नहीं जानता उनको

वो कान्हा सबका जाना – पहचाना,

बना सारथी धर्म युद्ध में

परन्तप को मिला ज्ञान अनजाना,

मन को भाता प्रेम उसी का

कहलाता सबका ईश् वो जाना -पहचाना,

दिव्य दृष्टि देकर जिसने

दिखा दिया निजरूप विराट

पर था जग ने उसको कब जाना ,

स्रष्टि को दृष्टि दे डाली

दिया प्रेम , कर्म का ज्ञान जाना -पहचाना,

आज तुम्हारे दर्शन को तरसें

नर नारी पर कृष्ण तो सबका जाना -पहचाना,

खोलें अन्तर्मन  की आँख

पाएं निज मन में कान्हा जाना -पहचाना ||

 

  

 

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

लघु कथा : विश्वास स्वरचित लघुकथा (मौलिक) द्वारा अमित तिवारी “शून्य

 

 

लघु कथा : विश्वास

स्वरचित लघुकथा (मौलिक)

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र.

 

आज अनिल कई सालों की मेहनत के बाद अपनी पीएचडी थीसिस और रिसर्च पेपर को कम्पलीट करने जा रहा था | अनिल आज कई सालों में पहली बार बहुत खुश दिखाई दिया था | उसने मानो कलम, किताब, जर्नल , लैपटॉप या कि पुरानी थीसिस के अलावा कुछ और दीखता भी कहाँ था  ! यहां तक कि वह अपने आप को भी भूल सा ही  गया था |  इस रिसर्च और उस पर आधारित शोध पत्र को भी रेपुटेड जर्नल में छपवाने का पड़ाव भी मानो उसने प्राप्त कर ही लिया हो जैसे; अज वो अपने रिसर्च  वर्क को लेकर अपना काम पूरा कर चुका था | इधर रिसर्च ही  जैसे उसके लिए जीवन का दूसरा पर्याय नाम बन गई हो जैसे ! लेकिन आज उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था | बड़ी श्रद्धा और खुशी से उसने अपने पीएचडी गाइड सर को फोन लगाया | वह उम्मीद तो यही कर रहा था की गाइड साहब उसका फोन नहीं उठाएंगे लेकिन वर्मा सर ने दूसरी घंटी पर ही फोन उठा लिया | चहकती आवाज़ में अनिल ने अपनी थीसिस और रिसर्च पेपर पूरी हो जाने की खुश ख़बर, औपचारिक चर्चा उपरांत प्राथमिकता पर की ; वर्मा  सर का रिस्पांस भी ठीक- ठीक ही लगा |  उन्होंने अपने स्कॉलर यानी अनिल को रिसर्च पेपर उन्हें ईमेल पर भेजने को कहा | अनिल ने सर के विश्वास में पेपर उनकी प्रतिक्रिया के लिए ईमेल से  भेज दिया | समय बीतता गया कुछ महीने बाद अपनी थीसिस जमा करने की औपचारिकता में सेंट्रल लाइब्रेरी में बैठा कुछ शोध पत्रिकाएँ पलट ही  रहा था | तभी अचानक उसकी नजर इंडेक्स को पलटते हुए उसी टाइटल के पूरे शोधपत्र पर पड़ी जो मूलतः अनिल ने लिखा था, जिसे राय मशविरे के लिए उसने वर्मा साब को दिया था ; जिसके ओथर के तौर वहां वर्मा  सर और उनकी बेटी ज्योति का था | यह देख कर वह मन ही मन उसके साथ हुए अविश्वास की घोर चिंता में डूब गया | आज उसका विश्वास गुरु- शिष्य परंपरा से हमेशा के लिए हट गया उसका विश्वास आज हताहत हो गया |

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र.

24.08.2021

गुरुवार, 19 अगस्त 2021

“धर्म और अध्यात्म में अंतर” स्वतंत्र आलेख द्वारा अमित तिवारी , सहायक प्राध्यापक भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्धन संस्थान, ग्वालियर म.प्र.

“धर्म और अध्यात्म में अंतर”

स्वतंत्र आलेख द्वारा अमित तिवारी , सहायक प्राध्यापक

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्धन संस्थान, ग्वालियर म.प्र.

(केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय का एक संगठन )

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यूँ तो सामान्यता धर्म को संस्कृत  शब्द ‘ धारयति’ इति धर्म  अर्थात, मानवीय संसर्गों में धारण करने हेतु जो उसका उद्दात्त कर्म क्षेपण है ; जिसे उसके द्वारा बिभिन्न परिस्तिथियों , बिभिन्न प्रक्रियाओं और भावनात्मक आवेग से गुजरते हुए भी धारण करना होता है ;और यथार्थ में यही धारेय ‘धर्म’; व्यक्ति की रक्षा विभिन्न पारिस्थितिक संसर्गों में करता ही है | इसे धर्मो रक्षति रक्षित के सन्दर्भों का सूत्र ही समझा जाना चाहिए |  यथा उदहारण स्वरुप एक ही कुल की दो पुत्र वधुएँ -सीता व उर्मिला का एक ही परिस्थिति में धर्म परस्पर अलग और विरोधी था ; किन्तु अपनी जगह स्थिर और स्पष्ट ही  | वही धर्म को कदाचित  पंथ के या इश्वर उपासना के संसर्ग भर में देखना मात्र एकाकी या उसका संकुचित सन्दर्भ है | यद्यपि इस चेष्टा से धर्म के वायवीय सिद्धांतों में मानव मात्र ही की बात करके मुझे प्राणी जगत के धर्म की परिणिति को न गिन पाने का दोष न देवें , वो तो स्वाभाविक संसर्ग होना ही है |

वही मानवीय सन्दर्भों में आध्यात्म का कदाचित व्यापक और अत्यंत स्वीकार्य स्वरुप आत्म अध्ययन अथवा बोध के प्रक्रम से होता है | विषद विश्व में जरा, जन्म और जीविका क्रम के चिंताग्रस्त मकड़ जाल में पड़ा मनुष्य स्वयं की मुक्ति और ईश्वरत्व को निज में प्राप्त कर पा लेने का धेय्य जिस गहन आतंरिक चेतना जुडाव प्रक्रिया द्वारा करता है ; उसे गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्पष्ट रूप से अध्यात्म या की राम से जुडाव संभाव्यता या अपने रचनात्मकता के शब्दों में कहूँ तो संभव है राम मिलें की आतंरिक यात्रा जैसा है |

          यहाँ स्पष्ट करना ही होगा की धर्म का मूल ही अध्यात्म की प्राप्ति या परिणति को तय करने की प्रक्रिया है और जिन्हें  आध्यात्मिक बल मिला वो धर्म को निरापद रूप में प्रति स्थापित करके नया बीज दे गए | यद्यपि धर्म  का ध्येय और आध्यात्म का प्रतिफल ही व्यक्ति का सही मायने में कल्याण है |

 


चित्र आधारित स्वरचित रचना “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’

  चित्र आधारित स्वरचित रचना     “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’ ग्वालियर, भारत ; 30.06.2023   ...