शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

बचपन के दिन भी अजीब थे द्वारा अमित तिवारी

 

चित्र आधारित रचना

अतुकांत कविता द्वारा अमित तिवारी शून्य

बचपन के दिन भी अजीब थे

 

आज याद मुझे आई

मेरे बचपन के दिन की

थोड़ी सी आंख भर आई

 

फिर मन में एक विचार उठा

जीवन बड़ा होने को था फिर भी अधीर

आज याद करके बचपन पाया

खुद को खुद के बेहद करीब

ए दोस्त क्या थी सोच

ना थी सोच और ना ही थी चिंता

भय था बस स्कूल का बस्ता

मस्ती का फाका जीवन का सार

आज लगे बाकी सब बेकार

वह हरियाली हो प्यारी बारिश

जिसमें भुट्टे खाने की ख्वाहिश

हम जब थे हम परतंत्र तब थे सच में स्वतंत्र

आज जब स्वतंत्र हैं लेकिन सच में हैं परतंत्र

जीवन की उहापोह की बारिश

बचपन का आनंद वितान

छुपा खुद ही से मेरा बचपन

मैं बचपन का करता तब कहाँ सम्मान ||

 

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य’

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

आलेख लेखन में विषय भाषा और उपसंहार का महत्व

 

आलेख लेखन में विषय भाषा और उपसंहार का महत्व

द्वारा अमित तिवारी

सहायक प्राध्यापक

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान

ग्वालियर मध्य प्रदेश

 

आलेख लेखन की एक बहु प्रचलित और परिष्कृत विधा युद्ध एक महत्वपूर्ण विधा है, और वर्तमान में यह अधिक प्रासंगिक और ज्यादा पढ़ी और समझी जाने वाली विधा भी बन गयी है | हिंदी या किसी अन्य भाषा में लिखे जाने वाले वे लेख आलेख कहे जाते हैं जिनमे आंकलन आधारित आंकड़ों की प्रस्तुति के साथ लेखक और पाठक के बीच सीधी तारतम्यता प्रदर्शित होती है | यह विधा हिंदी समेत किसी भी अन्य भाषा साहित्य में एक महत्वपूर्ण भूमिकाअदा करती है । यदि इस परिपेक्ष्य में  आलेख लेखन की प्रासंगिकता की बात की जाए तो ज्ञात होता है, कि आलेख लेखन में विषय एक महत्वपूर्ण एवं केंद्रीय भूमिका रखता है|  विषय वस्तु विभिन्न उपक्रमों के कालक्रम में एक सदैव एक अपरिहार्य तत्व  होता ही है| जिसका अपना विवेचित तादात्म्य होता है और जिसे सृजते समय- व्यक्तिगत, सामाजिक, समसामयिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, साहित्य सम्यक  आदि सभी समुच्चयों को द्रष्टिगत करना होता है; जो कि आलेख की आत्मा स्वरूप है।

 भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम भी है और शब्दों के उचित संयोजन द्वारा लेखक के विचारों को समस्त पाठक वर्ग तक उतने ही प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सकता है जितनी भाषा में प्रचुरता और शाब्दिक गंभीरता होती | अतः हिंदी जैसे समृद्ध भाषा के परिपेक्ष में परिपेक्ष को संपूर्ण करती ही है |

 शब्द संयोजन एवं विषय उद्दीपन भावों को भाषा में भरने का महत्वपूर्ण साधन है | किसी भी आलेख की सार्थकता किसी भी भाषा के साथ- साथ उसके समृद्ध विषय से ही होती है और दोनों मिलकर उसे परिपूर्ण  और परिष्कृत  बनाते  हैं| किसी भी हालत में आलेख की सार्थकता उसके उपसंहार की गहराई और उल्लेखित साक्ष्यों, तदर्थों के समन्वित  संक्षेपण के द्वारा पाठक के मन मस्तिष्क तक पहुंचने से होती है |  उपसंहार एक महत्वपूर्ण लेखनी परिपाटी है; जिसमें क्रमिकता के आधार पर आलेख की संपूर्णता, उसके विषय पर लेखक के निदानात्मक निरूपण के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है| अंततः सार्थकता से यह संक्षेपित किया जा सकता है कि आलेख लेखन में विषय ,भाषा और उपसंहार का महत्वपूर्ण योगदान रहता ही है ।

द्वारा अमित तिवारी

सहायक प्राध्यापक

भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान

ग्वालियर मध्य प्रदेश

22.07.2021

 

बुधवार, 21 जुलाई 2021

कुछ पल अपने लिए

 

कुछ पल अपने लिए

स्वयं को समर्पित

एक स्वरचित अतुकांत कविता

द्वारा “अमित तिवारी” शून्य

ग्वालियर , म.प्र.

 

ना वक़्त मुझको अपना कभी

न मिले न सही कुछ गिला भी नहीं

मैं समर्पण का समभाव रखता नहीं

थी शिकायत मुझको बस स्वयं से मगर

पा जो न सका समय के कुछ पल अपने लिए !!

 

धर्म को जानता, कर्म को साधता

या की अपनी कमाई से मैं घर पालता

हो गया बेदखल अपने ही मूल से

आज दर्पण मुझे खुद न पहचानता

वो भी कहता रहा डाल ले, कुछ पल अपने लिए !!

 

क्यों  रहा तू हमेशा जिन्दगी औरों पर वारता

ख्वाहिशें अब नहीं, न ही कोई चाव है

चोट मन पर लगी अब नहीं उसका भाव है

कर्म रत हो रहा ,न कुछ पल अपने लिए ही रहे !!

 

मेरे वक़्त पर अब नाम औरों के होते गए

पल से कल तक चला ,कल से वर्षों चला

आज वर्षों की बारिश श्वेताम्बरी हो चली

अब रहा न वो देह , न ही नेह भी रहा

थी शिकायत मुझे औरों से मगर

था टालता खुदी के अनमोल कुछ पल अपने लिए !!

 

अब अचानक बड़ा बेसबर हो रहा

न पल ही रहा, न ही विकल मैं रहा

ना सफल मैं रहा, न विफल मैं रहा

 

बस जो खोता गया

वो ही था.. बस एक मेरा अपना ..बस अपना

कुछ पल अपने लिए पर,... वो .. कहाँ पा सका !!

द्वारा : अमित तिवारी “शून्य”

21.07.2021, ग्वालियर म. प्र.

चित्र आधारित स्वरचित अतुकांत कवित्त द्वारा अमित तिवारी “शून्य“ साथी साथ चलना है मंजिलों पर हक़ तो अपना है जीत सबका सपना है रखकर इरादे ऊँचे वादा तो पूरा करना है || मुश्किलें तो आती हैं, मगर वो दूर हो जातीं हैं, बंदिशों से अपने लिखनी यह पाती है, जीत की इबारत थोड़ी सी जो बाकी है || मन एक कभी हारेगा, दूजा उसको सराहेगा, मिलकर मंजिल पर दोस्त उसे पहुंचाएगा, यह सब दल बल का काम होगा , तभी विजय पर हम सबका नाम होगा || द्वारा अमित तिवारी “शून्य” ग्वालियर म. प्र. 16.07. 2021

 

चित्र आधारित स्वरचित अतुकांत कवित्त

द्वारा अमित तिवारी “शून्य“

 

साथी साथ चलना है

मंजिलों पर हक़ तो अपना है

जीत सबका सपना है

रखकर इरादे ऊँचे वादा तो पूरा करना है ||

 

मुश्किलें तो आती हैं,

मगर वो दूर हो जातीं हैं,

बंदिशों से अपने लिखनी यह पाती है,

जीत की इबारत थोड़ी सी जो बाकी है ||

 

मन एक कभी हारेगा,

दूजा उसको सराहेगा,

मिलकर मंजिल पर दोस्त उसे पहुंचाएगा,

यह सब दल बल का काम होगा ,

तभी विजय पर हम सबका नाम होगा ||

 

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर म. प्र.

16.07. 2021   

 

मंगलवार, 20 जुलाई 2021

क्रिकेट की हार और ईदी; एक स्वरचित लघु कथा द्वारा अमित तिवारी “शून्य” ग्वालियर , म.प्र.

 

क्रिकेट की हार और ईदी;

एक स्वरचित लघु कथा

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र.

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भारत और पाकिस्तान के मैच का जिक्र आज यहां मैनचेस्टर में भी था और दोनों ही विश्व स्तरीय क्रिकेट टीमों के बीच की प्रतिस्पर्धा का आलम यह था कि अश्फाक और अमन दोनों के ही घर पर अपनी-अपनी टीमों को जिताने की परिपूर्ण ख्वाहिश न केवल उन दोनों पड़ोसी अप्रवासी परिवारों को उल्लासित  कर रही थी; बल्कि दोनों को ही अपने-अपने मुल्क पर मान और उनकी जीत के जज्बे को उन दोनों देशों के बीच ही राइवल्री आज दोनों ही पड़ोसियों को भी गैरमुल्क इंग्लैंड में अपने मुल्क की नुमाइंदगी करने का मौका भी दे रही थी।

वैसे अश्फाक और अमन पाकिस्तानी और भारतीय होने के साथ-साथ दोनों आपस में अच्छे पड़ोसी और एक अच्छे दोस्त बल्कि भाई जैसे थे लेकिन क्रिकेट के खेल के जज्बे ने दोनों को क्रिकेट के लिए ही सही कुछ देर के लिए अपने मुल्क की हिमायत करने और एक इंस्टेंट रायवलेरी को महसूस करवा ही दिया | दोनों अपने- अपने वतन से कोसों दूर; एक सी जुबान, संस्कार और अपने को भारतीय उपमहाद्वीप का होने के नाते एक परिवार से कम नहीं मानते थे , लेकिन आज इस मैच को लेकर दोनों के बीच मित्रता आधारित ही सही प्रतिस्पर्धा  तो बन ही आई थी | अश्फाक को सचिन तेन्दुलकर पसंद है ,लेकिन वह अकरम से पाकिस्तान के लिए मौका चाहता है | वहीं अमन को शोएब पसंद है पर आज वह शोएब के पीटे जाने  की दुआ कर रहा है | घर से दोनों एक ही कार से साउथ एवेन्यू के रास्ते ऐतिहासिक ओल्ड ट्रैफर्ड ग्राउंड पहुंच रहे थे; अमन और अश्फाक अपनी-अपनी टीमों के जर्सी के  रंग में रंगे थे ; हालांकि एक ही कार में ग्राउंड पर मैच देखने के लिए एक साथ ईद के दिन एक दूसरे के घरों से भेजे गए व्यंजनों को खाते पीते ग्राउंड पर दर्शक दीर्घा में पहुंचे |

टिकट के आधार पर आसपास की सीटों पर बैठ गए | ग्राउंड में क्रिकेट के बुखार के शुमार में दोनों मुल्कों के लोगों की फौज इस खेल के कलेवर में अपनी-अपनी उम्मीदों के रंग भर रही थीं, खेल की ऊर्जा और उतार-चढ़ाव बिजली और बादल की सी कौंध के साथ चलता रहा ,कभी पाकिस्तान हावी होता तो कभी भारत और कभी दोनों पर क्रिकेट और क्रिकेट का खेल के रोमांच की मस्ती | इस गैर मुल्क में भी अप्रवासियों के अपने आपस के स्नेह के साथ-साथ क्रिकेट और मुल्क के प्रति प्रेम और आदर का भाव उन्हें देश के लिए देश से दूर होने पर भी हर धड़कन पर जोड़ रहा था |

 ईद के त्यौहार की खुशी कोसों दूर भारत और पाकिस्तान में भी क्रिकेट की साझी प्रीत के साथ मनाई जा रही थी | बहरहाल खेल के मैदान पर पाकिस्तान एक नजदीकी हार की कगार पर आ गया था अश्फाक उदास था और अमन झूम रहा था लेकि अश्फाक के प्रति संवेदना उतनी ही गहरी थी | अश्फाक पाकिस्तान की एक नजदीकी हार से  से गमगीन था ...सो अमन ने उसे लगा अपने भाई समान दोस्त को कहा ‘’अच्छा खेलकर, एक अच्छी टीम से हारना कोई दुख की बात नहीं है’’... चलो दोस्त अब घर चलें आज भारत की जीत पर आंटी से ईदी लेनी है  | जब दोनों घर पहुंचे तो तस्लीमा ने परिवार समेत अपने बेटे जैसे अमन को क्रिकेट का बैट दिया जो उनकी अमन रूपी ईदी थी |  जिस पर लिखा था “अमन के लिए अमन का पैग़ाम ,जीते रहो जीतते  रहो” अमन की आंख भर आई और वह मां समान तस्लीमा के पैरों में गिर पड़ा तस्लीमा ने उसे  अपने बेटे की तरह गले से लगा लिया ; दोनों परिवारों में ईद की खुशी और अमन की इबादत थी ।

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

सोमवार, 19 जुलाई 2021

स्वरचित अतुकांत कवित्त : “दुनियादारी” द्वारा अमित तिवारी “शून्य” ग्वालियर , म.प्र.

 

स्वरचित अतुकांत

कवित्त : “दुनियादारी”

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र.

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कैसे छोड़ें दुनियादारी !!

ये दुनिया ही सबकी महतारी

बुनते-बनते सब दुनिया से

प्रेम द्वेष या बैर ही हों

निजता के कुछ जो भाव भी हैं

वो भी दुनियादारी के मोहताज़ सभी

हिंसा हिय की हो या कि

या की तन की सब इस दुनिया तक है

छोड़ी हमने जो यह दुनिया

तब ही रब को पाया है , पर

जब तक हैं इन झंझावातों में

कैसे छोड़ें दुनियादारी ??

कैसे छोड़ें दुनियादारी !!

यह दुनिया ही सबकी महतारी

 

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म. प्र.

19 .07.2021  

 

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

चित्र आधारित स्वरचित अतुकांत कवित्त द्वारा अमित तिवारी “शून्य“

 

चित्र आधारित स्वरचित अतुकांत कवित्त

द्वारा अमित तिवारी “शून्य“

 

साथी साथ चलना है

मंजिलों पर हक़ तो अपना है

जीत सबका सपना है

रखकर इरादे ऊँचे वादा तो पूरा करना है ||

 

मुश्किलें तो आती हैं,

मगर वो दूर हो जातीं हैं,

बंदिशों से अपने लिखनी यह पाती है,

जीत की इबारत थोड़ी सी जो बाकी है ||

 

मन एक कभी हारेगा,

दूजा उसको सराहेगा,

मिलकर मंजिल पर दोस्त उसे पहुंचाएगा,

यह सब दल बल का काम होगा ,

तभी विजय पर हम सबका नाम होगा ||

 

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर म. प्र.

16.07. 2021   

 

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

'कला और साहित्‍य का जीवन में महत्‍व'' आलेख द्वारा अमित तिवारी सहायक प्राध्‍यापक भा.प.या.प्र.सं. ग्‍वालियर

 

''कला और साहित्‍य का जीवन में महत्‍व''

आलेख द्वारा

अमित तिवारी

सहायक प्राध्‍यापक

भा.प.या.प्र.सं.

ग्‍वालियर

 

मानव जीवन एक बहुआयामी  जीवन परिदृश्‍य है और जीवन की सार्थकता प्रामाणिक तौर पर कला, साहित्‍य और उससे सृजित आनन्‍द के  ध्‍येय को  ही मानव जीवन का अभीष्‍ट माना जाता है। जिन्‍दगी सपने अनाहत प्रकम से कला व साहित्‍य सम्मत हो जीवन की जीवंतता का ध्‍येय गढ़ती है। कला और साहित्‍य जीवन के विकास प्रक्रम को प्रगाढ़ता और स्‍तरीयता की ओर ले जाने वाले दो अमिट जीवन प्रतीक स्‍वरूप हैं|  जिसे सांस्‍कृतिक तत्‍वों के तौर पर परिभाषित किया जाता है। सृष्टि द्वारा मनुष्‍य को दी गई दृष्टि और उसकी व्‍यष्टि से व्‍यक्ति आत्‍मोत्‍थान और विकास के नवीन शीर्ष तलाशता आया है, कला वैविध्‍य की बात की जाय तो यह सहज स्‍पष्‍ट होता है कि कला व साहित्य जीवन दर्शन को और जीवन शैली को नए मानदण्‍ड में गढ़ती हुई, पीढि़यों को प्रभावित कर सकने का माद्दा रखती है और सृजन शील व्‍यक्तियों के मन मस्तिष्‍क से होती हुई विकास के नवीन वितान गढ़ती है।

पारंपरिक तौर पर यदि देखा जाए तो कहा जा सकता है कि भारतीय कला और साहित्‍य ; सृजन की उत्‍तान आसंधि पर पहुंच शीर्षस्‍थ स्‍तरों से होती हुई वैविध्‍य प्रकारों की परिपाटी में पहचाने जाने लगी है। कलाओं को अनेको रूपों यथा- प्रदर्शित कला, स्थापन कला, लेखन, नृत्‍यकला, चित्रकला, गायन, वादन, संगीत, लोक कला के साथ-साथ साहित्यिक कृतियों जिनमें काव्‍य, महाकाव्‍य, उपन्यास , कहानी, कथा, लघुकथा और दर्शन व साहित्‍य आधारित अनेकानेक परिदृश्‍यों का समागम जीवन की महत्‍ता को न केवल संपूर्णता से भरता है वरन् उसे और अधिक शक्तिशाली और संवदेनशील , प्रखर, विन्‍यस्‍थ और परिपूर्ण बनाता है।

द्वारा अमित तिवारी

सहायक प्राध्यापक

भा.प. या. प्र. स.

ग्‍वालियर

दिनांक - 15 जुलाई 2021

बुधवार, 14 जुलाई 2021

"गीत कोई गुनगुनाओ” एक स्वरचित अतुकान्त कविता द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘ ग्वालियर म.प्र.

 

"गीत कोई गुनगुनाओ”

एक स्वरचित अतुकान्त कविता

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘  ग्वालियर म.प्र.

 

मेरे दोस्त तुम क्यों दुखी हो,

  जरा सा तो तुम मुस्करा दो,

        दिल की कोई बात छेडो,

           खुलकर कोई गीत गुनगुनाओ।।

 

              बहुत हार देखी है तुमने मगर,

                   क्या खुद से हार जाओगे,

                       ठहरो ज़रा सा फ़लक पर,

                         विजय श्री का गीत कोई गुनगुनाओ।।

                          

                           महकता है वो आंगन, जो बस

                                तुम दिल की तमन्ना भर खिला लो,

                                  बहुत डर के फ़लसफ़े हैं पाले,

                                     अब निडरता का गीत कोई गुनगुनाओ ।।

                                 

                                         स्फटिक सी चमकती है दुनिया,

                                             बडे आर्कषण, यहॉ पर हैं भारी,

                                                ना समझो खुद को तमस तुम,

                                                    सतोमय सरस गीत कोई गुनगुनाओ ।।

 

अमित तिवारी ‘शून्य‘

ग्वालियर म.प्र.

दिनांक- १४.०७.२०२१

मंगलवार, 13 जुलाई 2021

स्वरचित लघु कथा द्वारा :अमित तिवारी “शून्य” ग्वालियर , म.प्र. शीर्षक—अनुभूति

 

स्वरचित लघु कथा द्वारा :अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर , म.प्र.

शीर्षक—अनुभूति

 

वंदना के पैरों तले से मानो जमीन ही निकल गयी हो जैसे, जब उसे अकाउंटेंट से पता चला; कि कल से उसे नौकरी पर आने के लिए मना कर दिया गया है ; हालाँकि मुस्कराते हुए यह बात ऐसे कही गयी की दो तीन महीनों के लिए प्रोजेक्ट ससपेंड हुआ है, इसलिए आपको अभी मना कर रहे हैं ..फिर शायद तीन -चार महीने में फिर से याद करेंगें | पर न जाने इस बुरी खबर ने वंदना को; जो घर में एक मात्र कमाने वाली थी को ...जैसे चिंता के गहरे सागर में डाल दिया हो | लेकिन मन ही मन उसे अनुभूति हो आई की जरूरत के समय मिली इस नौकरी और इतने अच्छे ऑफिस और मैनेजर सर ( रमेश) जो उसे हमेशा एक बड़े भाई की तरह हर समय काम और उसके प्रति उसके रवैये के लिए हमेशा समझाते थे ....उनकी सारी बातें याद आ रहीं थी ....और उसे अनुभूति हो आई की कैसे उसने अपने गलत रवैये और आराम परस्ती से कोरोना काल में मिली एक बेहद अच्छी नौकरी जो न केवल उसके परिवार का इस कठिन समय में सहारा था; को खो दिया बल्कि आज उसने रमेश जैसे बड़े भाई सरीखे एक नेक प्रोफेशनल की पोजीशन को भी चोट तो पहुंचाई ही थी  ...जो कि अक्सर उसे बहुत स्पष्टता लेकिन मर्यादित शब्दों में वो हमेशा कहते कि “ बेटा तुम काम के प्रति ...थोडा जिम्मेदारी तो रक्खा करो ...और समझो शायद इस समय में इतनी अच्छी नौकरी जो मिली है उसकी क़द्र करा करो ..” इस अचानक गिरी गाज़ के लिए उसे यकीनन समझ आ गया की उसने क्या कुछ गलतियाँ कर दीं ... अफ़सोस आज इस दुखद समाचार ने उसे अनुभूति दिला ही दी कि उससे क्या चूक हुई ....और क्यों और कैसे उसने ... शायद आसानी से मिली नौकरी के मायने अपनी नादानियों ....जैसे  ऑफिस आवर्स में दोस्तों को लम्बी - लम्बी फ़ोन कॉल करना, ...फाइलों को समय पर न निपटाना और हर समय काम को टालते रहना , सीनियर अफसर की बातें इधर से उधर करना और उनके दिए काम न करना  ..सब कुछ बीते एक साल ...का वो हर एक वाक्या... इंटरव्यू से लेकर  नौकरी के इस पल तक की सारी अनुभूतियाँ ...मगर अफ़सोस अपनी गलतियों की सच्ची अनुभूति उसे देर से और नौकरी गँवा कर ही हुई |  

सोमवार, 14 जून 2021

सब्र एक अतुकांत कविता द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

 

सब्र  

एक अतुकांत कविता

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

 

तिनको को अगर बनाना एक पेड़,

तो दिले नादाँ तुझे सब्र से काम लेना होगा

 

अटखेलियाँ करते बचपन को

जो देखना चाहो बढ़ते तो सब्र रखना होगा

 

खुद के सपनो को बनने में हकीकत

लगती हो कुछ देर तो अपनी कर्मठता में सब्र न करो

 

क्रोध में सब्र हो

विरोध में सब्र हो

राह में सब्र हो

 

टूटे

मायूस

दिल जलों

किसी

शख्स

 

...

को भी फिर

सब्र

जोड़ता

है

मोड़ता है

एक नयी

तैयारी

उर्जा

और

विजय

की तरफ

...

 

हाँ

सब्र

बस

सब्र

 

...

एक अदद

सब्र !!

 

      द्वारा – अमित तिवारी “शून्य”

ग्वालियर

 

चित्र आधारित स्वरचित रचना “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’

  चित्र आधारित स्वरचित रचना     “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’ ग्वालियर, भारत ; 30.06.2023   ...