शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

जीत क्या है ? - एक स्वरचित कवित्त द्वारा अमित तिवारी 'शून्य'

 

“जीत” क्या है  

एक स्वरचित कविता

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य’

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जीत क्या है

एक सीख है

हार के प्रतिकार का प्रतीक है

यह कर्म रूपी धर्म है

याचना नहीं रण की प्रार्थना है

दया जब क्रोध के साथ आती है

तो पतितों की जीत बन जाती है

स्नेह के कर्म का मानिंद बन जाती है

शकुन्तला का प्रणय जब एक रीत होती है

भूले हुए भारत की तब जीत होती है

रिक्त कोई स्थान हार का कहा होता है

जब हर पल कर्म व विश्वास प्रेरित जीत होती है

नर हो जीत न मिलने पर निराश ना होना है

यह तो तप है निष्काम कर्म है

नितांत के न्याय का एक परम धर्म है

जीत का वरण वही कर पाता है

जो हार से सीख प्रयासरत रहता है

द्वारा अमित तिवारी “शून्य” 18.09.2020

बुधवार, 16 सितंबर 2020

उत्सव (स्वरचित अतुकांत कवित्त ) : द्वारा अमित तिवारी "शून्य"

 

स्वरचित अतुकांत कवित्त

शीर्षक : उत्सव

द्वारा : अमित तिवारी ‘शून्य’

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फिर आएगा उत्सव का दौर

करें सब मिलकर थोडा सा गौर

 

माना दम तोडती रही जिन्दगी

पर पटरी पर वापस आएगी

 

आने वाले समय में उत्सव

मिलकर फिर मनाये सब

 

धैर्य रखा है धैर्य रखेंगे

जीत का उत्सव यहाँ गढ़ेंगे

 

जीत रोग से जीत शोक से

जीत पतन से जीत जतन से

 

पर उत्सव से पहले पृथ्वी पर वापस

प्रकृति को मान दिलाएंगे

आयें मिलकर प्रकृति के उत्त्थान का उत्सव

मिलकर सभी मनाएंगे

 

 

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

16.09.2020

 

  

 

 

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

लघुकथा : विषय "प्रतिज्ञा " शीर्षक : कर्मठता द्वारा अमित तिवारी 'शून्य'

 

स्वरचित लघुकथा

विषय : प्रतिज्ञा

शीर्षक : कर्मठता

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

 

राजश्री काकी की बगिया में आज बहुतेरे फूल – फल आदि खिले हुए हैं लेकिन आज की यह हरीतिमा फल है उस कठोर प्रतिज्ञा रूपी कर्मठता का जिसे, उन्होंने काका को जाते जाते प्रतिज्ञा स्वरुप वचन में दिया था I उनकी गहरी आँखों में आज भी काकाश्री का वो दृश्य याद आ जाता है जब कर्मठता की पराकाष्ठा करने वाले काकाश्री जब मृत्यशैय्या पर पड़े तो अमिता से ; (काका श्री उन्हें अमिता बुलाते थे) प्रतिज्ञा करायी की; मेरे न रहने पर भी तुम इस बगीचे को यु ही हरा भरा रखोगी और हमारी इस बगिया में युही फूल – फल की कर्मठता के बीज बोती रहोगी I पहले तो काकी श्री को यह प्रतिज्ञा स्वरुप कर्मठता का वचन रूपी आग्रह समझ नहीं आया लेकिन जैसे-जैसे समय बीता उन्हें समझ आया कि क्यों- काका श्री (अमितेंद्र नाथ) ने उन्हें यह प्रतिज्ञा करवाई, वो इसलिए क्योंकि वो जानते थे कि “बीतते समय और एकांकी जीवन में उद्देश्य रूपी कर्मठता की कमी जीवन को  नितांत नीरस व उद्देश्य हीन बना देता है I जिसमे अपने प्रियजन को खोना, बढती उम्र सब राग़- रंग को खो देती है और जीवन की कटुता मनुष्य को प्रतिपल मृत्यु से अधिक मारती है’’ ,

इसलिए काका श्री द्वारा दिलाई गयी वह कठोर कर्मठता की प्रतिज्ञा काकी श्री को आज भी जीवन का धेय्य, हरियाली उनकी प्रतिज्ञा रूपी नेह के तौर पर स्वस्थ्य रखे हुए है जिसे उनके द्वारा प्रतिपल नेह के धागे के तौर पर निभाया भी जाता रहा ; जिसने उनके जीवन को उद्देश्य पूर्ण और समांगी कर दिया है I बगिया के फल – फूल को पाने का धेय्य बच्चों व पड़ोसियों को काकी श्री व उनके स्वास्थ्य से जोड़े रहता है I दिन भर एक उत्साह व कर्तव्य रूपी कर्मठता उनके शरीर को स्वस्थ व मन को उद्देश्यपूर्ण बनाये रखता है I पर नेह भर आते हैं जब काका श्री की दी हुई कर्मठता की प्रतिज्ञा याद दिलवाने का समय याद आता है और मन उत्सुकता से भर जाता है और खुशियों के एह्सास ऐसे प्रतीत होता है , जैसे स्वयं काका श्री जीवन पथ में प्रतिज्ञा बन उनके साथ हों ; उत्तम स्वास्थ्य, जीवन का उद्देश्य और आयुष्मान का आशीष लेकर I सार्थक ही है ऐसी “कर्मठता” की प्रतिज्ञा I

 

 

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य’

15.09.2020    

 

सोमवार, 14 सितंबर 2020

"हिन्दी "- हिन्दी दिवस एक भाव कवित्त द्वारा अमित तिवारी "शुन्य "

 

हिन्दी /हिन्दी दिवस

अतुकांत  स्वरचित कवित्त (हिन्दी दिवस विशेष )

द्वारा अमित तिवारी

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है

हिंदी

ममत्व की भाषा

राष्ट्रबोध की हितैषी

जननी है  यह  ,

माँ भारती का बिम्ब है

धरा पर दया रूप धारिणी है

निज जन के हृदय पातक तारिणी है

अम्ब सलिला सुमुखा सी

भारती- तम स्नेह नेह निर्झरी सी है

हिन्दी भाल पर चन्द्र सी है

 

लता –पता विनोदिनी सी रही है

सुभ्र हो रवीन्द्र सम रम्य तप रही है

निज लोचन सी गोचर हो विद्द्रुम सी खिली है

 

नितांत बह रही है

निज नेह भाव कह रही है

गढ़ –रही सर्जन के वितान

तीर्थ बन गए देवनागरीय वितान

सर्व क्लेशहारिणी

संताप शोक नाशिनी

ह्रदय- सूक्ष्म भाव प्रेषति

मनो- विचार धारिणीं

हिन्दी- स्वाभाव सुभ्र सी

पराभव भाव तारिणी

नेह-भार धारिणी

हृदय विहला समभाषनी

 

ममत्व मयी हरिता

हिन्द की सी धरिता

निज जनों को बांधती

शत- सूत्र

राष्ट्र नेह

के उद्भासिती

हिंदी- प्रणय प्रभासिती

भारत हृदय वासिनी

 

निज जन –गण- मन की रंजिनी

स्वातंत्र्य वीर अभ्ययांजिनी

सुर सरिता साधती

माँ –ममत्व पालती

 

हिंदी विजय उद्घोष सी

तिमिर पाप मोचती

हर हृदय का दंभ है

हिन्दी विजय का प्रारंभ है

युगों के वितान का

सुरमयी आरभ्म है

-(जय हिंदी ,जय भारती )

 

द्वारा अमित तिवारी “शून्य “

हिन्दी सेवक -14.09.2020

 

 

रविवार, 13 सितंबर 2020

रोना- धोना अतुकांत स्वरचित कविता द्वारा अमित तिवारी

 

रोना-धोना

अतुकांत स्वरचित कविता

द्वारा अमित तिवारी शून्य

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यह जीवन का रोना धोना

तो बस यूहीं चलता जाएगा

 

क्या तेरे हाथ में था

और क्या लेकर इस धरा से जाएगा

 

भाग रहा जीवन से जो तू

निज कर्मफल से भी क्या बच पाएगा

 

खेल लेखनी का भी है खूब पर क्या

छोड़ लेखनी भी क्या तू इन सब से बच पाएगा

 

रोटी रोजी कि ये दौड़ करती तुझको यू मजबूर

खेल देखने वालों को आखिर यह क्यों समझ आएगा

 

ना याचना ना कि पलायन ही

कर्मो की कारा से मुक्त तुझे कर पायेगा

 

प्यारे ,ये रोना –धोना तो मरते दम तक ही

साथ निभाएगा, तो उठ छोड़ अब रोना धोना

बना कर्म को नियति और खुद का नया बिछोना

छोड़ राग रुदन का बस होने दे जो है होना

कर्म ही निज हाथ में तेरे

और इस मनुज तन से बस इसका तय है होना

 

बस विवेक रख ,ध्यान दे

बस सत्कर्मो को ही बना प्रयोजन निज हाथों से होना

 

द्वारा अमित तिवारी “शून्य“

13.09.2020

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

लघुकथा श्राद्ध द्वारा अमित तिवारी "शून्य "

 

स्वरचित लघु कथा  शीर्षक “श्राद्ध”

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘

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अंगद बेसब्री से पितृ पक्ष का इंतजार कर रहा था शायद उसके लिए पितृ पक्ष के मायने आजीविका को पुनः पटरी पर लाना होता है, यू तो कोई विरला ही भोजन के लिए पूछता था पर महज इन 15 दिनों में आहार और दाम (आमदनी) तय होती है। पडोस से नित्य प्रति कोई न कोई निमंत्रण अंगद को मिलता ही था कुछ स्थितियों में परिवार का भी दिन भर का भोजन और उपहार आदि मिल ही जाता था लेकिन अंगद को इंतजार था समर्थ परिवार के निमंत्रण का आज षष्ठी है लेकिन समर्थ परिवार का कोई निमंत्रण अब तक प्राप्त नही हुआ। आयोजन तो अष्टमी के दिन होता है,ऐसा सोचकर अंगद अपने कामों में व्यस्त हो गया। अंगद के पांडित्य कर्म की जजमानी का एक बडा आधार समर्थ परिवार हमेशा से रहा है, लेकिन आज परिवार अपने संस्कारों को लेकर एक बडी उलझन में है ।ये उलझन कुछ और नही पीढियों में श्राद्ध-पक्ष के प्रति पनपते परिवर्तन और पीढियों के एक टकराव की स्थिति है। रामजश जो हमेशा से अंगद के परिवार के बुजुर्गों को, अब अंगद को अपने श्राद्ध पक्ष में मुख्य पांडित्य कर्ता के तौर पर याद करते थे आज उनकी अगली पीढी उनसे विचारों का मतभेद रख श्राद्ध और पितृ पक्ष को न मनाए जाने की अपनी सी जिद उठाए हुए हैं यद्यपि परिवार में ऐसा पहली बार ही हुआ है लेकिन रामजश का मन आहत है क्योंकि आज तक निर्विवाद इन मसलों पर गृहस्थी चलती आई थी परिवार का समाज में बहुत नाम था और पुरखो की कृपा भी अक्षुण्ण बरस रही थी। रामजश का मन उदास हो गया और सोचने लगा मेरे मरने पर ये पीढी मुझे क्या तर्पण करेगी? चलो अपने जीते जी तो ये परंपरा नही टूटने दूंगा। रात भर नींद नही आई मन बैचेन रहा सुबह अंकित को बुला क्रोध में भर चीखने लगे- “मै मर जाऊं तो मत करना मत करना मेरा श्राद्ध मेरे जीते जी मेरे पुरखे बिना श्राद्ध के नही रहेंगे’’ । सुनकर अंकित की आंखों में पपश्चाताप के आंसू थे बिना सांस रोके बोल पडा  “बाबूजी बच्चों और बहू की बात को आप क्यों तरजीह देते हैं मेरे संस्कार ऐेसे नही कि आपकी परम्पराओं को यूं ही मिटा दूं ; वे अगली पीढी के आजाद बच्चे है जब जीवन की लिखत पढ़त सीखेगे तो वही करेगे जो आपने सिखाया है; एक बात आप मेरी भी सुन लीजिए मेरे जीते जी भी मेरे पुरखे या उनका श्राद्ध कोई नही रोक सकता हाँ मेरे बाद कोई रोके तो अलग बात है”, पर यकीन है कि आपके संस्कार इतने गाढे है कि अगली कई पीढी तो छोडे उनकी कई पीढियाँ भी आपके संस्कारों की जद में रहेंगीं। ऐसा मुझे यकीन ही नही पूर्ण विश्वास है। रामजश ऐसा सुनकर स्वयं के परिवार के संस्कारों पर फूला न समाया और अंकित को अपने हृदय से लगा लिया और बोले कल मेरे दादाजी का श्राद्ध में अंगद जी के पूरे परिवार को निमंत्रण भेज दो और भोजन पानी की उत्तम व्यवस्था करो। साथ पैसे की कोई कमी आने मत देना जितना तुम चाहो खर्च करो। दोनो ख़ुशी –ख़ुशी श्राद्ध की तैयारी में जुट गए। अंदर परिवार भी दोनों की बात सुनकर उनके संस्कारों पर गर्व और अपनी भूल का अनुभव कर रहा था।

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य‘

09.08.2020

रविवार, 6 सितंबर 2020

मैं बुलबुले सी हूँ ........... एक चित्रलेखन द्वारा अमित तिवारी 'शून्य'

 चित्रलेखन 

बुलबुले 

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य’

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मैं ख्वाहिस हूँ 

बस इन बुलबुलों जैसी 

मैं ख्वाहिस हूँ 

एक पिता की चुलबुली सी

नेक हूँ नाक हूँ 

अपने बाबा की 

अनकही सी 

पहेली हूँ 

स्वाभिमान हूँ 

मेरे पिता का 

पहले लगता था 

क्या हूँ 

आज जाना 

सब हूँ 

सब कुछ ही तो हूँ 

अपने बाबा की 

अपनी दादी की 

बिट्टो

लाड्डो

गुडिया

मैं

खुश 

हूँ 

बस इन बुलबुलों जैसी 


द्वारा अमित तिवारी 

अपनी बेटी को समर्पित


शनिवार, 5 सितंबर 2020

शिक्षक दिवस बनाम शिक्षक , शिक्षा , समाज और शिक्षकों को समर्पित एक आलेख द्वारा अमित तिवारी 'शून्य'

 

शिक्षक दिवस बनाम शिक्षक, शिक्षा, समाज और शिक्षकों को समर्पित एक आलेख

द्वारा :अमित तिवारी “शून्य“

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राष्ट्र नायक श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन जोकि भारत वर्ष के भूत पर्व उपराष्ट्रपति एवं जाने माने शिक्षा विद रहे हैं, के जन्म दिवस को राष्ट्र एक बहुत महत्वपूर्ण दिन के तौर पर श्री सर्वपल्ली के सम्मान में मनाता आया है। भारत यू तो त्यौहारों का देश रहा है और यहां दिवस और तिथियों का बडा महत्व रहता है। लेकिन त्यौहारों को और गुरू शिष्य परंपरा को मानने वाले इस देश में असल में शिक्षक शिक्षा  और समाज की असलियत क्या है? वो एक बडा विचारणीय प्रश्न है।

            कालान्तर में आजादी के बाद देश में शिक्षा के क्षेत्र में कई नियामक बनाए गए, कई नीतियां आईं और समाज में बदलाव के लिए शिक्षा में बदलाव की बात को भी समय- समय  पर उकेरा गया। 5 सितंबर आते ही यू तो हम सबको इस देश के निर्माता, प्रणेता और पालनहार सामान्य शब्दों में कहे तो भगवान नही महज हाड- मांस का एक पुतला शिक्षक जो विभिन्न स्तरों पर समाज को विद्यार्थियों के माध्यम से शिक्षित एवं ध्येय देने का काम करता आया है। एक ओर की जमीनी हकीकत ये भी है जिसमें शिक्षक का हित, स्तर, आकांक्षाएं अकादमिक, रोजगार आदि सब हासिये पर है एक ओर तो संस्थागत शिक्षकों की कमी है जिसे केवल ज्ञापित भर किया जाता है उन्हें आंकडों पर भी स्थापित नही किया जा पाया शिक्षकों को अभी भी कई उपनामों एवं अनिश्चित मानदेयों के मकड जाल में उलझाना मानों प्रशासन की शान हो, का ही परिणाम है कि अतिथि शिक्षक ,शिक्षा कर्मी विभिन्न किस्म के वर्ग शिक्षक, शिक्षा शिल्पी आदि जैसे शब्द जिनका प्रशाशनिक मूल्य केवल आधे -अधूरे मानदेय को देकर तिरस्कार से भरे रवैये से उस व्यक्ति की मजबूरियों का उत्तखनन कर ऐन-केन प्रकारेण अपनी प्रशाशनिक गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाना और देश के मीडिया पटल को बताना कि भावी पीढी के लिए शिक्षा जगत में समाज के लिए कोई उच्च स्तरीय कार्य किया गया हो; बडा ही गैर जिम्मेदाराना और राष्ट्र द्रोह जैसा ही कार्य है इस भाव को समझने के लिए लियो टाल्सटाय के एक विचार को समझते है ‘‘ विकासशील देशों के प्रति उनकी स्थति का आकलन उस समाज के शिक्षकों के स्तर (अकादमिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति ) के आकडों से लगाई जा सकती है।‘‘

            दूसरा विचार यदि भारतीयता के परिदृश्य में लिया जाए तो चाणक्य के कहे गए सूत्र ये समझने के लिए पर्याप्त होगें जो कि इस प्रकार है; ‘‘शिक्षक  वो है जो राष्ट्र का निर्माता, प्रणेता और उसके विनाश तक को निर्धारित कर सकता है .... युद्ध तो मैदानों में होते है लेकिन राष्ट्रवाद का मूल शिक्षक के मस्तिष्क से होता हुआ युवाओं  की शिराओं में रक्त के तौर पर बहता है जिससे राष्ट्र जीते और हारे जाते है।‘‘

            बहरहाल आज की स्थिति में हमारे द्वारा शिक्षकों को देने के लिए केवल सम्मान होना काफी नही है यद्यपि शैक्षणिक मर्यादाओं को न पाल पाने वालों केा शिक्षक  पद भी नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन जिन्हें ये पद या जिम्मेदारी दी गई है उनके प्रति पूरे वर्ष के सम्मान, स्तरीय आर्थिक और सामाजिक विकास के हकदार होने का ध्येय हमेशा पूरा करना ही होगा । साथ ही समाज के प्रति शिक्षक की जिम्मेदारी और कठिनतर होती जा रही है और समाज को भी शैक्षणिक मानदण्डों, शैक्षणिक परिवेश बनाना होगा लेकिन शिक्षा के बाजारीकरण और दुकानदारी व्यवस्था से देश को बचाना ही होगा।

            देश के भविष्य और परिस्थितियों के संदर्भ में आज शिक्षक और उसकी भूमिका बहुत प्रासंगिक है देश को उसके महान शिक्षकों के लिए और महान शिक्षकों को इस महान देश के लिए तपना तो पडेगा ही। देश और शिक्षकों का इस शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

द्वारा अमित तिवारी “शून्य”

दिनांक  05.09.2020

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

भाव पल्लवन समय सृजन में लगता है , विसर्जन में नहीं (रिश्ते हों या जिन्दगी ) द्वारा : अमित तिवारी “शून्य”

 

भाव पल्लवन

समय सृजन में लगता है , विसर्जन में नहीं (रिश्ते हों या जिन्दगी )

द्वारा : अमित तिवारी “शून्य”    

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मन में विचारों का घना कुहरा सा उमड़ा हुआ था और दिन भर की व्यस्तता के साथ एक छोटे से अंतराल के लिए बैठा ही था की सामने वाले घर से कुछ आवाजें आ रहीं प्रतीत हुयी I जब पता किया तो मालूम हुआ सामने वाले आनंद भाईसाहब के किरायेदार रवि ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया है, इस बात की चर्चा चाल रही थी I नंदिनी , ऊँचे स्वर में विलाप कर रही थी कि “आज आपने मुझे और मेरे रिश्ते को विसर्जित तो अवश्य कर दिया है लेकिन याद करिए वो दौर जब हमे अपने इस रिश्ते को बनाने में कितना समय लगा था I खेर आज आपको मेरी उन भावनाओ की क़द्र नहीं तो यह रिश्ता मेरी तरफ से भी टूट गया, अब इसमें कोई एक पल और भी ज्याया नहीं करुँगी I”

ऐसा कहकर मकान के सामने खड़ी नंदिनी हाथ में एक छोटा सा झोला लिए तेज क़दमों के साथ आगे निकल गयी I लोग तो खेर तमाशबीन बने खड़े रहे ; खुसर- फ़ुसर भी होती ही रही I लेकिन मुझे जिन्दगी के इस कडवे सच और रवि की रिश्तो को न निभा पाने की कमजोरी पर भरोसा नहीं हो रहा था ; क्यों उसने इस रिश्ते को समय देकर क्यों नहीं सृजित किया ....खेर  आज उसके रिश्ते और जिन्दगी एक दोराहे पर थे ; पर यकीनन नंदिनी के रिश्ते व जिन्दगी को जैसे विसर्जन की बड़ी त्रासदी झेलनी पड़ी , जिसे बनाने में उसने अपने जीवन का बहुमूल्य समय और भावनाए लगा दी; वो भावनाए , कल्पनाये सपने सब जो समय की परिधि में देखे थे ; गढ़े थे समयातीत से हो एक पल में ढेर हो गए I मायने यह ही रहे सृजन में समय लगता है विसर्जन में नहीं ; वो तो पल भर में हो जाता है रिश्ते हों या जिन्दगी I

 

द्वारा : अमित तिवारी “शून्य”

03.09.2020                  

 

बुधवार, 2 सितंबर 2020

झिझक - संकोच - हिचक एक स्वरचित अतुकांत कविता द्वारा अमित तिवारी 'शून्य'

 

झिझक – संकोच –हिचक

अतुकांत स्वरचित कविता द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य’

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हिचक कैसी,

झिझक  कैसी,

और कैसा संकोच,

हो आया

स्वयं की काबिलियत

पर क्यों तुम्हें

अफ़सोस हो आया

निमिष में नहीं था

जो तुम्हे मिल नहीं पाया

मिला जो है उसी को

क्या पाल पाए हो

अंगड़ाई में तुम्हारी जीत छुपती है

दर्पण से दंभ और डर कैसा

हेय नहीं हो तुम

फिर भी

हिचक

झिझक

और

संकोच

ने तुमको अधुरा सा बना डाला

हिचक छोड़ो

झिझक छोड़ो

और संकोच को छोड़ो

उठो जीवन के ऊत्कर्ष पर

कर्म पर

कर्त्तव्य पर

दृढ़ता पर

जागो  सोचो  की क्या कुछ

नवीन करना है

नेह में स्वयं को

और स्वयं का ध्येय बनना है

 

हिचक की हीनता छोड़ो

संकोच का दर्पण तोड़ो

झिझक की बेड़ियाँ काटो

 

स्वरचित अतुकांत कविता

द्वारा अमित तिवारी ‘शून्य’

०२.०९.२०२०   

चित्र आधारित स्वरचित रचना “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’

  चित्र आधारित स्वरचित रचना     “ अतुकांत रचना” द्वारा डॉ अमित तिवारी “शून्य” शीर्षक : ‘मन के तार’ ग्वालियर, भारत ; 30.06.2023   ...